मुस्लिम समुदाय पर ‘भागवत ज्ञान’

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मोहन भागवत के मुस्लिम समुदाय पर बदलते बयानों ने 2029 की भाजपा-आरएसएस राजनीति को लेकर बहस तेज कर दी है।

2029 के लिए बदल रही है भाजपा-आरएसएस की राजनीतिक भाषा!

रितेश सिन्हा

न्यूयॉर्क में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने मुस्लिम समुदाय को लेकर जो बयान दिया है, वह केवल सामाजिक सद्भाव का संदेश नहीं है। इसके भीतर संघ की बदलती भाषा और आने वाली राजनीति के संकेत भी देखे जा सकते हैं। भागवत ने कहा कि यदि कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू नहीं है। उन्होंने विविधता को प्रकृति का नियम बताते हुए अलग-अलग पहचान के सम्मान और मानवता की एकता की बात की। यह बयान निश्चित रूप से स्वागत योग्य है, लेकिन इसकी राजनीतिक अहमियत तब और बढ़ जाती है जब इसे भागवत के पिछले वर्षों के बयानों और 2029 के लोकसभा चुनाव की संभावित राजनीतिक जमीन के साथ रखकर देखा जाए।

मोहन भागवत के मुस्लिम समाज को लेकर बयानों में बदलाव अचानक नहीं आया है। इसका एक क्रम दिखाई देता है। वर्ष 2018 में उन्होंने कहा था कि हिंदू राष्ट्र की कल्पना मुसलमानों के बिना नहीं की जा सकती। उनका तर्क था कि हिंदुत्व भारत की विविधता को स्वीकार करने वाली विचारधारा है। उस समय भी संघ प्रमुख की यह भाषा आरएसएस की पारंपरिक छवि से अलग दिखाई दी थी। सवाल तब भी यही था कि यदि हिंदू राष्ट्र की अवधारणा में मुसलमानों के लिए स्थान है तो उस अवधारणा की राजनीतिक और सामाजिक सीमाएं क्या हैं।

वर्ष 2021 में भागवत ने गाजियाबाद में मुस्लिम समाज से जुड़े एक कार्यक्रम में कहा कि सभी भारतीयों का डीएनए एक है। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता की बात को भी एक अर्थ में अनावश्यक बताया, क्योंकि उनके अनुसार दोनों पहले से ही एक हैं। उन्होंने यह भी कहा कि किसी हिंदू का यह कहना कि भारत में मुसलमान नहीं रहने चाहिए, हिंदुत्व की भावना के अनुरूप नहीं है। यह 2018 के बयान से आगे की भाषा थी। अब मुस्लिम समाज को केवल भारत में रहने का अधिकार देने की बात नहीं थी, बल्कि उसे भारतीय राष्ट्रीय समाज का स्वाभाविक हिस्सा बताया जा रहा था।

इसी दौरान भागवत ने भीड़ द्वारा हत्या और हिंसा को लेकर भी स्पष्ट टिप्पणी की थी। उनका कहना था कि किसी मुसलमान की हत्या करने वाला व्यक्ति हिंदुत्व के खिलाफ जाता है। राजनीतिक दृष्टि से यह महत्वपूर्ण था, क्योंकि संघ प्रमुख हिंदुत्व के नाम पर हिंसा की वैधता को अस्वीकार करते दिखाई दे रहे थे। इसका संदेश यह था कि हिंदुत्व का अर्थ किसी दूसरे धार्मिक समुदाय के खिलाफ हिंसा नहीं हो सकता।

इसके बाद भी भागवत कई अवसरों पर मुस्लिम समाज को लेकर आश्वस्त करने वाली बातें करते रहे। उन्होंने कहा कि भारत में इस्लाम और मुसलमानों को कोई खतरा नहीं है। हालांकि उसी के साथ वे मुस्लिम समाज से भारत की संस्कृति और साझा राष्ट्रीय पहचान से जुड़ने की अपेक्षा भी रखते रहे। इसलिए उनकी भाषा को पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष राजनीति की भाषा कहना सही नहीं होगा। यह संघ की अपनी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा के भीतर मुस्लिम समाज के लिए स्थान बनाने का प्रयास है।

वर्ष 2025 में भागवत ने हिंदू शब्द की परिभाषा को धार्मिक पहचान से आगे ले जाने की बात की। उन्होंने भारत को अपनी मातृभूमि मानने और भारतीय संस्कृति से जुड़ाव रखने वाले मुस्लिम तथा ईसाई समुदाय के लोगों को व्यापक सभ्यतागत अर्थ में हिंदू कहे जाने की बात रखी। यहां संघ प्रमुख की कोशिश स्पष्ट दिखाई देती है—हिंदू पहचान को केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति की व्यापक पहचान के रूप में प्रस्तुत करना।

अगस्त 2026 में न्यूयॉर्क में भागवत ने इस भाषा को और स्पष्ट कर दिया। उन्होंने कहा कि यदि कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए तो वह हिंदू नहीं है। उन्होंने विविधता, मानवता की एकता और अलग-अलग धार्मिक पहचान के सम्मान को भारतीय सभ्यता से जोड़ा। यह बयान उनके पिछले बयानों की अगली कड़ी है, लेकिन इसकी राजनीतिक गूंज इसलिए अधिक है क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिया गया है।

यदि इन सभी बयानों को एक साथ रखा जाए तो एक स्पष्ट क्रम दिखाई देता है। 2018 में मुसलमानों के बिना हिंदू राष्ट्र की कल्पना को नकारना, 2021 में हिंदू-मुसलमानों को एक राष्ट्रीय समाज का हिस्सा बताना, मुस्लिम विरोधी हिंसा को हिंदुत्व के विरुद्ध बताना, बाद में मुसलमानों को भारत में सुरक्षित होने का आश्वासन देना, 2025 में हिंदू की सभ्यतागत परिभाषा को व्यापक करना और 2026 में मुसलमानों को भारत से बाहर करने की सोच को हिंदुत्व के खिलाफ बता देना—यह केवल शब्दों का बदलाव नहीं है। भागवत की सार्वजनिक राजनीतिक भाषा निश्चित रूप से अधिक समावेशी हुई है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह बदलाव क्यों हो रहा है?यहीं से मामला सीधे राजनीति से जुड़ जाता है। आरएसएस स्वयं को राजनीतिक दल नहीं बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन बताता है, जबकि भाजपा चुनावी राजनीति की सबसे प्रमुख राजनीतिक शक्ति है। दोनों की भूमिका अलग है, लेकिन वैचारिक संबंध किसी से छिपा नहीं है। संघ प्रमुख के लगातार बदलते सार्वजनिक संदेश का भाजपा की राजनीतिक भाषा पर असर होना स्वाभाविक है। यदि भागवत मुस्लिम समाज को भारत की साझी पहचान का हिस्सा बता रहे हैं तो इसे 2029 के राजनीतिक वातावरण से पूरी तरह अलग करके देखना मुश्किल है।

2024 के लोकसभा चुनाव ने भाजपा को एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश दिया। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन अपने दम पर बहुमत से दूर रही और उसे सहयोगी दलों के समर्थन की आवश्यकता पड़ी। इससे यह स्पष्ट हुआ कि राष्ट्रीय राजनीति में सामाजिक और क्षेत्रीय गठबंधनों की भूमिका अभी भी निर्णायक है। 2029 की ओर बढ़ते हुए भाजपा के सामने चुनौती केवल अपने पारंपरिक समर्थक आधार को बनाए रखने की नहीं होगी, बल्कि नए सामाजिक समूहों के बीच स्वीकार्यता बढ़ाने की भी होगी।

यहीं भागवत की मुस्लिम समाज पर बदलती भाषा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। भाजपा को लंबे समय से मुस्लिम मतदाताओं के बीच सीमित समर्थन वाली पार्टी माना जाता रहा है। यदि संघ प्रमुख लगातार यह संदेश देते हैं कि मुसलमान भारत के स्वाभाविक नागरिक हैं और उन्हें भारत से बाहर करने की सोच हिंदुत्व के विरुद्ध है, तो यह भाजपा के लिए अपनी छवि को व्यापक बनाने का अवसर हो सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि भाजपा अचानक अपनी पूरी वैचारिक राजनीति बदल देगी। चुनावी राजनीति में किसी समुदाय का पूरा समर्थन हासिल करने से ज्यादा महत्वपूर्ण कभी-कभी उसके बीच मौजूद पूर्ण विरोध की धारणा को कमजोर करना होता है। यदि मुस्लिम समाज का कुछ हिस्सा भाजपा को पूर्णतः अस्वीकार्य मानने के बजाय स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवारों के आधार पर अलग-अलग निर्णय लेने लगे, तो उसका चुनावी असर कई सीटों पर पड़ सकता है।

यही कारण है कि 2029 के संदर्भ में भागवत की भाषा को संभावित राजनीतिक पुनर्संयोजन के संकेत के रूप में पढ़ा जा सकता है। भाजपा अपने पारंपरिक हिंदू सामाजिक आधार को बनाए रखते हुए मुस्लिम समाज के बीच संवाद बढ़ाने की कोशिश करे, तो उसके लिए राजनीतिक विस्तार का एक नया रास्ता खुल सकता है। संघ की ओर से आने वाली समावेशी भाषा इस बदलाव के लिए वैचारिक आधार भी उपलब्ध करा सकती है। यहां एक बड़ा राजनीतिक जोखिम भी है। भाजपा का पारंपरिक समर्थक वर्ग यदि भागवत की इस भाषा को वैचारिक नरमी के रूप में देखता है तो संघ को अपने ही आधार को समझाना पड़ेगा कि मुस्लिम समाज को स्वीकार करना हिंदुत्व से पीछे हटना नहीं है। दूसरी तरफ मुस्लिम समाज के सामने भी सवाल रहेगा कि क्या यह वास्तविक वैचारिक परिवर्तन है या 2029 के चुनाव से पहले राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश।

भागवत के बयान की वास्तविक परीक्षा भारत की जमीन पर होगी। यदि उनके विचार वास्तव में संघ की बदलती दिशा को प्रतिबिंबित करते हैं तो आने वाले वर्षों में इसका असर दिखाई देना चाहिए। मुस्लिम समाज के साथ संवाद बढ़ना चाहिए, धार्मिक पहचान के आधार पर नफरत की राजनीति पर संघ का रुख स्पष्ट होना चाहिए और भाजपा की राजनीतिक भाषा में भी इस समावेशी दृष्टिकोण की झलक दिखाई देनी चाहिए।

किसी समुदाय को यह कहना कि वह भारत में रह सकता है और यह कहना कि वह भारत की साझी राष्ट्रीय पहचान का बराबर का हिस्सा है—दो अलग बातें हैं। भागवत की भाषा धीरे-धीरे दूसरे दावे की ओर बढ़ती दिखाई देती है। यही उनके वर्तमान बयानों का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू है।

न्यूयॉर्क में दिया गया संदेश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण है। संघ प्रमुख अब केवल भारतीय श्रोताओं को संबोधित नहीं कर रहे थे। वे वैश्विक भारतीय समुदाय और अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के सामने भारत की विविधता और सह-अस्तित्व की तस्वीर प्रस्तुत कर रहे थे। इससे संघ की वैश्विक छवि को अधिक स्वीकार्य बनाने की कोशिश भी दिखाई दे सकती है। लेकिन इसी कारण आलोचकों का सवाल भी महत्वपूर्ण है कि यदि यह संघ की वास्तविक सोच है तो यही भाषा भारत की राजनीतिक बहस में भी उतनी ही मजबूती से क्यों नहीं दिखाई देती।

2029 तक भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि वह हिंदुत्व की अपनी राजनीतिक पहचान और व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता के बीच संतुलन कैसे बनाती है। क्या वह केवल हिंदू मतदाताओं के व्यापक एकीकरण पर निर्भर रहेगी या अपनी राजनीति को ऐसे सामाजिक गठबंधन में बदलने की कोशिश करेगी जिसमें मुस्लिम समाज के कुछ हिस्सों के लिए भी राजनीतिक जगह बने?

मोहन भागवत के बयानों को देखते हुए ऐसा लगता है कि संघ इस दूसरे रास्ते की संभावनाओं को कम से कम वैचारिक स्तर पर तलाश रहा है। लेकिन इसे अभी अंतिम राजनीतिक रणनीति कहना उचित नहीं होगा। चुनावी रणनीति का वास्तविक स्वरूप आने वाले वर्षों में भाजपा के फैसलों, उम्मीदवारों, गठबंधनों और सार्वजनिक भाषा से ही स्पष्ट होगा।

भागवत की बदलती भाषा का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि वे हिंदुत्व को केवल धार्मिक बहुसंख्यक पहचान के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय भारतीय सभ्यता की व्यापक पहचान के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। इसमें मुस्लिम और ईसाई भी स्थान पा सकते हैं। यह हिंदुत्व का अंत नहीं, बल्कि हिंदुत्व की पुनर्व्याख्या है।

यदि यह 2029 तक भाजपा की राजनीतिक भाषा में दिखाई देती है तो भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन माना जाएगा। भाजपा अपने पारंपरिक आधार को बनाए रखते हुए अपने विरोधी सामाजिक समूहों के बीच भी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश कर सकती है। लेकिन यदि यह बदलाव केवल संघ प्रमुख के भाषणों तक सीमित रहा तो इसे राजनीतिक रणनीति या छवि सुधार से आगे देखना कठिन होगा। मोहन भागवत का न्यूयॉर्क बयान भाजपा के लिए अवसर भी है और परीक्षा भी। अवसर इसलिए कि वह अपनी राजनीति का सामाजिक दायरा बढ़ा सकती है। परीक्षा इसलिए कि इस भाषा को जमीन पर उतारना आसान नहीं होगा।

मुस्लिम समाज को भी इस बदलाव को केवल शब्दों के आधार पर स्वीकार करने के बजाय उसके वास्तविक परिणामों को देखना होगा। आखिर लोकतंत्र में किसी समुदाय के लिए सबसे बड़ा सम्मान यह नहीं कि उसके बारे में अच्छा भाषण दिया जाए, बल्कि यह है कि उसे समान नागरिक, समान अवसर और समान राजनीतिक हिस्सेदारी मिले।

आज यह कहना जल्दबाजी होगी कि भागवत के बयान 2029 की भाजपा रणनीति का हिस्सा हैं। यह कहना भी कठिन है कि उनका बदलता स्वर राजनीति से पूरी तरह अलग है। संघ प्रमुख की भाषा में बदलाव हुआ है और वह लगातार एक दिशा में हुआ है—मुस्लिम समाज को भारत की साझी राष्ट्रीय पहचान में शामिल करने की दिशा में। सवाल भाजपा और आरएसएस के सामने है—क्या यह बदलाव केवल शब्दों में रहेगा या 2029 तक राजनीति में भी दिखाई देगा?चुनाव से पहले राजनीतिक दल अपनी भाषा बदल सकते हैं, लेकिन विचारधारा तभी बदलती है जब उसके साथ व्यवहार भी बदलता है। मोहन भागवत की भाषा बदलती दिखाई दे रही है; अब 2029 यह तय करेगा कि भाजपा और आरएसएस की राजनीति भी वास्तव में बदली है या केवल उसका शब्दकोश।

अस्वीकरण: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तथ्यों, आंकड़ों और रिपोर्टों पर आधारित लेखक का व्यक्तिगत विश्लेषण है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और इनका उद्देश्य केवल जनहित में विषय पर विमर्श प्रस्तुत करना है।

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