सोना छोड़ो, तेल बचाओ: क्या आर्थिक संकट के मुहाने पर खड़ा है भारत?

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‘वर्क फ्रॉम होम’ से लेकर गोल्ड खरीद रोकने की अपील तक: पीएम मोदी के संदेश में छिपी अर्थव्यवस्था की बेचैनी

दिल्ली रितेश सिन्हा । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से एक वर्ष तक सोना नहीं खरीदने, पेट्रोल-डीजल की खपत घटाने, अनावश्यक वाहन उपयोग से बचने, मेट्रो और साझा यात्रा को अपनाने, खाद्य तेल कम उपयोग करने तथा “घर से काम” जैसी व्यवस्था को फिर बढ़ावा देने की अपील की है। पहली नजर में यह राष्ट्रहित में किया गया सामान्य आह्वान लगता है, लेकिन इसके भीतर देश की अर्थव्यवस्था को लेकर गहरी चिंता भी दिखाई देती है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष, महंगे होते कच्चे तेल, बढ़ते आयात बिल और विदेशी मुद्रा पर बढ़ते दबाव के बीच सरकार यह समझ चुकी है कि आने वाला समय आसान नहीं है। यही कारण है कि पहली बार प्रधानमंत्री को सीधे जनता से संयम और बचत की अपील करनी पड़ी है।

क्यों नहीं दी गई सार्वजनिक परिवहन को  गति ?

भारत आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है, लेकिन दूसरी ओर सच्चाई यह भी है कि देश अपनी कई बुनियादी जरूरतों के लिए विदेशों पर निर्भर है। कच्चा तेल, खाद्य तेल, सोना, रासायनिक उर्वरक, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और मशीनरी का बड़ा हिस्सा आज भी आयात किया जाता है। जैसे ही दुनिया में युद्ध या तनाव बढ़ता है, भारत का आयात खर्च बढ़ जाता है और इसका सीधा असर महंगाई तथा रुपये पर पड़ता है। प्रधानमंत्री ने पेट्रोल और डीजल बचाने की बात कही। यह चिंता स्वाभाविक है क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। लेकिन सवाल यह है कि जब वर्षों से ऊर्जा संकट की आशंका जताई जा रही थी, तब वैकल्पिक ऊर्जा और सार्वजनिक परिवहन को उतनी गति क्यों नहीं दी गई?

सरकार बिजली से चलने वाले वाहनों की बात करती है, लेकिन देश के अधिकांश हिस्सों में उनके लिए जरूरी ढांचा अब भी कमजोर है। छोटे शहरों और गांवों में सार्वजनिक परिवहन की हालत भी बहुत बेहतर नहीं है। ऐसे में लोगों से वाहन कम चलाने की अपील एक तरह से मजबूरी की स्वीकारोक्ति भी लगती है। “घर से काम” की व्यवस्था को फिर बढ़ावा देने की बात भी इसी चिंता का हिस्सा है। कोरोना काल में यही व्यवस्था देश की अर्थव्यवस्था को चलाने का माध्यम बनी थी। महामारी खत्म होते ही कार्यालय संस्कृति को फिर सामान्य बना दिया गया, लेकिन अब ईंधन बचाने के लिए उसी व्यवस्था को दोबारा अपनाने की बात कही जा रही है। इससे साफ है कि सरकार आने वाले समय में ऊर्जा खर्च को लेकर दबाव महसूस कर रही है।

सबसे अधिक चर्चा प्रधानमंत्री की उस अपील पर हो रही है जिसमें उन्होंने लोगों से एक वर्ष तक सोना नहीं खरीदने का आग्रह किया। भारत दुनिया में सबसे अधिक सोना खरीदने वाले देशों में शामिल है। भारतीय परिवारों के लिए सोना केवल गहना नहीं, बल्कि सुरक्षा और बचत का साधन भी है। ऐसे में सरकार की यह अपील बताती है कि विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव को लेकर चिंता वास्तविक है। लोग सोने की ओर इसलिए जाते हैं क्योंकि उन्हें अन्य निवेश व्यवस्थाओं पर उतना भरोसा नहीं होता। यदि सरकार चाहती है कि लोग सोना कम खरीदें, तो उसे ऐसी आर्थिक व्यवस्था बनानी होगी जिसमें आम नागरिक को सुरक्षित और स्थिर निवेश का भरोसा मिले।

यहीं पर भारत के विकास मॉडल पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। चीन ने पिछले तीन दशकों में जिस आक्रामक विनिर्माण नीति को अपनाया, उसने उसे दुनिया की सबसे बड़ी उत्पादन शक्ति बना दिया। चीन ने केवल कारखाने नहीं लगाए, बल्कि अनुसंधान, तकनीकी शिक्षा, निर्यात और उत्पादन पर लगातार निवेश किया। वहां योजनाएं केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि जमीन पर उतारी गईं। आज वियतनाम, दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया और बांग्लादेश जैसे छोटे देश भी विनिर्माण के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। वे दुनिया की बड़ी कंपनियों को आकर्षित कर रहे हैं। इन देशों ने तेज निर्णय, सरल व्यवस्था और उत्पादन आधारित नीति अपनाई है।

इसके उलट भारत में आज भी “मेक इन इंडिया” जैसी योजनाओं का बड़ा हिस्सा प्रचार तक सीमित दिखाई देता है। अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में भारत की स्थिति अब भी कमजोर है। विश्वविद्यालयों, उद्योगों और तकनीकी संस्थानों के बीच समन्वय का अभाव है। नई तकनीक, मशीन निर्माण, रक्षा उपकरण और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र में भारत अब भी बाहरी देशों पर निर्भर है। इस स्थिति के लिए केवल सरकार ही नहीं, बल्कि नौकरशाही भी कम जिम्मेदार नहीं है। वर्षों से योजनाएं बनती हैं, घोषणाएं होती हैं, लेकिन उनका बड़ा हिस्सा कागजों और बैठकों तक सीमित रह जाता है। उद्योग जगत लंबे समय से यह शिकायत करता रहा है कि भारत में सबसे बड़ी समस्या नीति नहीं, बल्कि उसका क्रियान्वयन है। फाइलों में उलझी व्यवस्था और मंजूरी में देरी ने अनेक योजनाओं की गति रोक दी।

विपक्ष भी अब इन्हीं सवालों को उठा रहा है। विपक्ष का कहना है कि यदि अर्थव्यवस्था वास्तव में मजबूत होती, तो सरकार को जनता से त्याग और बचत की अपील नहीं करनी पड़ती। विपक्ष यह भी पूछ रहा है कि यदि विदेशी मुद्रा बचाना इतना जरूरी है, तो विलासिता के आयात पर सख्ती क्यों नहीं की जाती? यदि पेट्रोल बचाना जरूरी है, तो ईंधन पर करों में राहत क्यों नहीं दी जाती? केवल आलोचना से समाधान नहीं निकलेगा। दुनिया इस समय बड़े आर्थिक संकटों से गुजर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का तनाव और वैश्विक व्यापार में अस्थिरता ने लगभग हर विकासशील देश पर दबाव बढ़ाया है। भारत भी इससे पूरी तरह अछूता नहीं रह सकता।

भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि वह इस संकट को अवसर में कैसे बदले। सबसे पहले देश को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में तेज कदम उठाने होंगे। सौर और पवन ऊर्जा को गांवों और छोटे शहरों तक पहुंचाना होगा। सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना होगा और बिजली से चलने वाली बसों तथा सरकारी वाहनों का तेजी से विस्तार करना होगा।

दूसरा बड़ा क्षेत्र कृषि है। प्रधानमंत्री ने रासायनिक उर्वरकों की खपत घटाने और प्राकृतिक खेती की बात कही है। यह विचार भविष्य के लिए उपयोगी हो सकता है, लेकिन इसके लिए किसानों को आर्थिक सुरक्षा और प्रशिक्षण देना जरूरी होगा। केवल अपील से खेती का तरीका नहीं बदलता। खाद्य तेल के मामले में भी भारत को आत्मनिर्भर बनना होगा। सरसों, सोयाबीन और सूरजमुखी जैसी फसलों को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर अभियान चलाने की जरूरत है।

सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र विनिर्माण और रोजगार का है। जब तक भारत बड़े पैमाने पर उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था नहीं बनेगा, तब तक आयात पर निर्भरता कम नहीं होगी। छोटे और मध्यम उद्योगों को सस्ती बिजली, सरल कर व्यवस्था और तेज प्रशासनिक सहायता देनी होगी। इसके साथ ही अनुसंधान और विकास में भारी निवेश करना होगा। दुनिया अब केवल सस्ते श्रम से नहीं, बल्कि नई तकनीक और नवाचार से आगे बढ़ती है। यदि भारत को सचमुच आत्मनिर्भर बनना है, तो उसे विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों और उद्योगों को एक साथ जोड़ना होगा।

आज भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसकी वैश्विक महत्वाकांक्षाएं और घरेलू आर्थिक वास्तविकताएं आमने-सामने दिखाई दे रही हैं। एक ओर पांच ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था और विश्व नेतृत्व की बात हो रही है, दूसरी ओर जनता से सोना न खरीदने और तेल बचाने की अपील की जा रही है। यह विरोधाभास ही आज की सबसे बड़ी सच्चाई है। यदि सरकार इस चुनौती को अवसर में बदलना चाहती है, तो उसे केवल भावनात्मक अपीलों से आगे बढ़कर उत्पादन, अनुसंधान, कृषि और ऊर्जा सुरक्षा पर ठोस और कठोर फैसले लेने होंगे। वरना जनता से त्याग की अपील कुछ समय तक असर दिखाएगी, लेकिन लंबे समय तक कोई भी अर्थव्यवस्था केवल अपीलों के सहारे नहीं चल सकती।

 

डिस्क्लेमर:
यह लेख रितेश सिन्हा के व्यक्तिगत विचार, विश्लेषण और समसामयिक आर्थिक परिस्थितियों की उनकी समझ पर आधारित है। लेख में व्यक्त मत आवश्यक नहीं कि किसी समाचार संस्था, संगठन या प्रकाशक के आधिकारिक विचार हों। इसमें उल्लिखित तथ्य, टिप्पणियां और विश्लेषण सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध सूचनाओं, सरकारी बयानों तथा मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं। लेख का उद्देश्य केवल जनचर्चा और विषय पर विमर्श को बढ़ावा देना है।

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