सांसद बनाम सचिव: बृजमोहन अग्रवाल और अमित कटारिया के टकराव ने खोली नौकरशाही की परतें
रितेश सिन्हा दिल्ली। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता का जनादेश होता है। जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनकर विधानसभा और संसद में भेजती है ताकि वे उसकी आवाज़ सरकार तक पहुंचा सकें। जब नौकरशाही स्वयं को जनप्रतिनिधियों से ऊपर समझने लगे, तब लोकतंत्र का संतुलन डगमगाने लगता है। छत्तीसगढ़ में इन दिनों जो घटनाक्रम सामने आ रहे हैं, उन्होंने इसी संवैधानिक संतुलन पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल और स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया के बीच सामने आए कथित विवाद ने सत्ता के गलियारों में यह चर्चा तेज कर दी है कि आखिर राज्य में वास्तविक निर्णय कौन ले रहा है—जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि या कुछ प्रभावशाली अधिकारी?
भाजपा सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने प्रदेश के तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव आईएएस अमित कटारिया पर जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा और कथित अमर्यादित प्रशासनिक रवैये के गंभीर आरोप लगाते हुए लोकसभा सचिवालय में विशेषाधिकार हनन की शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के अनुसार, जनहित से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों पर भेजे गए पत्रों और बार-बार प्रेषित स्मरण-पत्रों के बावजूद अमित कटारिया ने महीनों तक कोई जवाब देना भी आवश्यक नहीं समझा। बृजमोहन अग्रवाल ने इसे केवल एक अधिकारी की कार्यशैली का मामला नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के अधिकारों और सम्मान की अवहेलना बताया था।
अब एक बार फिर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और गृहमंत्री विजय शर्मा को पत्र लिखकर उन्होंने पुलिस व्यवस्था की बदहाली, पुलिस बल में भारी रिक्तियों, संसाधनों की कमी और प्रशासनिक उदासीनता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह घटनाक्रम इस बहस को और मजबूत करता है कि क्या छत्तीसगढ़ में नौकरशाही जनप्रतिनिधियों की अपेक्षा अधिक प्रभावी होती जा रही है, और क्या निर्वाचित प्रतिनिधियों की आवाज़ भी प्रशासनिक तंत्र में अनसुनी रह जा रही है? 18 जुलाई 2026 को लिखे गए अपने पत्र में सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने मुख्यमंत्री और गृहमंत्री को यह पत्र इसलिए लिखा क्योंकि जो कानून-व्यवस्था की नई व्यवस्था (कमिश्नरेट) बनाई गई है, वह जमीन पर ठीक से काम नहीं कर रही। नियोक्ता बढ़ गए हैं लेकिन आरक्षक, प्रधान आरक्षक, उपनिरीक्षक और ट्रैफिक पुलिस जैसी जरूरी तैनाती और संसाधन कम हैं, इसलिए जनता को सुरक्षा और ट्रैफिक नियंत्रण में दिक्कतें हो रही हैं।
यह कोई विरोध नहीं, बल्कि सुधार मांगने जैसा कदम है।
सांसद का काम अपनी जनता की समस्याएँ उठाना होता है; लिखित पत्र से सरकार पर जल्दी कार्रवाई करने का दबाव बनता है और लोगों को भी पता चलता है कि उनकी शिकायत दर्ज हुई है। छत्तीसगढ़ की राजनीति में वर्षों से कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को लेकर असाधारण प्रभाव की चर्चा होती रही है। कभी कांग्रेस विपक्ष में रहते हुए तत्कालीन सरकार पर आरोप लगाती थी कि कुछ अधिकारी पूरी व्यवस्था को नियंत्रित कर रहे हैं। यह केवल राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था पर उठता गंभीर प्रश्न है। इसी संदर्भ में एक पुरानी राजनीतिक अभिव्यक्ति फिर चर्चा में है—”क्या डॉ. रमन सिंह के सुपर सीएम आज भी छत्तीसगढ़ चला रहे हैं?” यह सवाल किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक संस्कृति पर है जिसमें कुछ अधिकारियों का प्रभाव इतना बढ़ जाता है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगते हैं। यदि ऐसा है, तो यह किसी सरकार के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता।
रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल नए जनप्रतिनिधि नहीं हैं। वे 8 बार के विधायक, मंत्री और सांसद हैं। यदि उनके स्तर का वरिष्ठ जनप्रतिनिधि किसी अधिकारी के व्यवहार को लेकर असंतोष व्यक्त करता है तो इसे सामान्य प्रशासनिक मतभेद कहकर टाला नहीं जा सकता। यह उस व्यवस्था का संकेत है, जहां जनप्रतिनिधि और नौकरशाही के बीच संवाद का संतुलन बिगड़ता दिखाई देता है। अधिकारी चाहे जितने सक्षम, अनुभवी और प्रभावशाली हों, वे जनता के जनादेश से ऊपर नहीं हो सकते। प्रशासन का उद्देश्य सरकार चलाना नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों को जनता तक पहुंचाना है।
पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य सेवाओं की कार्यप्रणाली, विभागीय निर्णयों और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। राज्य में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौतियां, अस्पतालों में संसाधनों का अभाव और अब आपातकालीन सेवाओं की निविदा प्रक्रिया पर उठे प्रश्न यह संकेत देते हैं कि स्वास्थ्य विभाग केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सार्वजनिक जवाबदेही का भी विषय बन चुका है। यदि किसी विभाग की कार्यप्रणाली लगातार विवादों में है, तो उसके शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी से सवाल पूछना लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रिया है, न कि किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध अभियान।
स्वास्थ्य विभाग से जुड़े एक और घटनाक्रम ने पूरे मामले को कहीं अधिक गंभीर बना दिया। यह घटनाक्रम है 108 संजीवनी एक्सप्रेस सेवा की निविदा प्रक्रिया, जिस पर अब पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।कम्युनिटी एक्शन एंड मोटिवेशन प्रोग्राम (कैंप) ने पत्रांक CAMP/CG/2025-26/087 के माध्यम से छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (सीजीएमएससी) के प्रबंध संचालक को विस्तृत शिकायत भेजी है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि 11 जुलाई 2025 को जारी निविदा के बाद निविदा-पूर्व बैठक में प्राप्त सुझावों के आधार पर 20 अगस्त 2025 को जारी संशोधित दस्तावेज में 35 से अधिक तकनीकी मूल्यांकन मानदंड जोड़े या बदले गए। संस्था का दावा है कि इन परिवर्तनों के कारण कई अनुभवी और पात्र कंपनियां प्रतिस्पर्धा से बाहर हो गईं और निविदा प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित हुई।
कैंप ने यह भी कहा है कि उसने इस विषय में पहले भी पत्रांक 036, 037, 069 और 078 के माध्यम से लगातार आपत्तियां दर्ज कराई थीं, लेकिन उन पर कोई संतोषजनक कार्रवाई नहीं हुई। संस्था की मांग है कि विवादित तकनीकी मानदंडों को हटाकर निविदा प्रक्रिया को पुनः पारदर्शी बनाया जाए और सभी पात्र कंपनियों को समान अवसर दिया जाए। इन आरोपों पर संबंधित विभाग का पक्ष और किसी भी आधिकारिक जांच के निष्कर्ष महत्वपूर्ण होंगे।
प्रश्न किसी एक कंपनी का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है, जिसमें सरकारी खरीद प्रक्रिया की विश्वसनीयता दांव पर लग जाती है। यदि किसी निविदा में नियमों में व्यापक बदलाव किए जाते हैं, तो सरकार की जिम्मेदारी केवल यह कह देने से पूरी नहीं होती कि सब कुछ नियमानुसार हुआ। सरकार को यह भी बताना पड़ता है कि बदलाव क्यों किए गए, किस आधार पर किए गए और उनसे प्रतिस्पर्धा पर क्या प्रभाव पड़ा। 108 संजीवनी एक्सप्रेस जैसी सेवा कोई साधारण योजना नहीं है। सड़क दुर्घटनाओं में घायल व्यक्ति, प्रसूति के लिए अस्पताल पहुंचने वाली महिला, हृदयाघात का मरीज या किसी दूरस्थ गांव में रहने वाला गंभीर रोगी—इन सभी के लिए यह सेवा जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर बन सकती है।
जब विभाग लगातार विवादों में हो, जब उसकी कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठ रहे हों और जब उसी विभाग की महत्वपूर्ण निविदा पर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हों, तब स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया की भूमिका और विभागीय जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार इस पूरे विवाद की स्वतंत्र जांच कराने को तैयार है? यदि विभाग पूरी तरह निर्दोष है तो जांच सबसे पहले उसी विभाग की विश्वसनीयता को मजबूत करेगी। यदि शिकायतें लगातार सामने आती रहें और सरकार केवल मौन साधे रहे, तो संदेह और गहरा होना स्वाभाविक है।
इससे पहले भी वरिष्ठ अधिकारी अमन सिंह (आईआरएस) को लेकर भ्रष्टाचार और प्रभाव के दुरुपयोग के आरोप लंबे समय तक राजनीतिक विमर्श का विषय रहे। उन आरोपों को लेकर विभिन्न स्तरों पर जांच और जवाबदेही की मांग भी उठी थी। स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न फिर उठ रहा है कि क्या छत्तीसगढ़ में प्रभावशाली अधिकारियों के लिए जवाबदेही के मानदंड अलग हैं?
इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी आरोप लगाया कि राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था कुछ सीमित हाथों में सिमट गई है और कुछ अधिकारी निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं। यह एक राजनीतिक आरोप है, लेकिन जब उसी समय सांसद और वरिष्ठ अधिकारी के बीच विवाद तथा स्वास्थ्य विभाग पर सवाल भी सामने हों, तब सरकार के लिए इन मुद्दों को केवल राजनीति कहकर खारिज करना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
डॉ. रमन सिंह, जिन्होंने लंबे समय तक मुख्यमंत्री के रूप में शासन चलाया और आज संवैधानिक पद पर हैं, उनसे स्वाभाविक अपेक्षा है कि वे लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा और प्रशासनिक अनुशासन के पक्ष में स्पष्ट संदेश दें। प्रशासनिक तंत्र से जुड़े अमित कटारिया, अमन सिंह, सुबोध कुमार सिंह, रजत कुमार और ओ.पी. चौधरी जैसे नामों पर अलग-अलग स्तर पर यह आरोप लगाए जा रहे हैं कि प्रदेश को मनमाने ढंग से चलाने में उनकी भूमिका रही है या वे कथित तौर पर ऐसे निर्णयों से जुड़े रहे हैं जिनसे पारदर्शिता और संस्थागत संतुलन पर सवाल उठे। छत्तीसगढ़ को ऐसी प्रशासनिक संस्कृति की आवश्यकता है जिसमें जनप्रतिनिधियों का सम्मान हो, अधिकारी जवाबदेह हों, और किसी भी निविदा या नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता सर्वोपरि रहे। यदि व्यवस्था में यह संतुलन बिगड़ता है, तो सबसे बड़ा नुकसान किसी व्यक्ति या दल का नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र का होगा।
अस्वीकरण: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तथ्यों, आंकड़ों और रिपोर्टों पर आधारित लेखक का व्यक्तिगत विश्लेषण है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और इनका उद्देश्य केवल जनहित में विषय पर विमर्श प्रस्तुत करना है।