हाशिये पर जाती कांग्रेस का सूरत-ए-हाल, अंधा बांटे रेवड़ी

admin
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Highlights
  • कांग्रेस का संकट केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति का संकट है।
  • आरोप: संघर्षशील कार्यकर्ताओं की बजाय शीर्ष नेतृत्व के करीबी नेताओं को प्राथमिकता।
  • पार्टी में निर्णय लेने की शक्ति सीमित नेताओं और शक्ति केंद्रों तक सिमटने का आरोप।
  • बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की स्थिति पर गंभीर सवाल।
  • मल्लिकार्जुन खड़गे का चयन स्वाभाविक, लेकिन अन्य नामों पर विवाद और बहस।
  • प्रणव झा के नाम से नेतृत्व के करीबी लोगों को तरजीह मिलने की धारणा मजबूत।

कांग्रेस राज्यसभा उम्मीदवार सूची को लेकर पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ा है। क्या राज्यसभा सीटें संघर्षशील कार्यकर्ताओं के बजाय नेतृत्व के करीबी नेताओं को दी जा रही हैं? पढ़ें विस्तृत विश्लेषण।

  • जनसंघर्ष नहीं, दरबारी राजनीति का पुरस्कार- राज्यसभा?

रितेश सिन्हा दिल्ली । कांग्रेस का संकट केवल चुनावी पराजय का नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति का है जिसने पार्टी को जनता से दूर और दरबार के करीब पहुंचा दिया है। जिस पार्टी ने कभी गांव-गांव से नेतृत्व खड़ा किया था, वही पार्टी आज राज्यसभा की सीटों को ऐसे बांटती दिखाई देती है मानो यह संगठन के संघर्षशील कार्यकर्ताओं का नहीं बल्कि शीर्ष नेतृत्व की कृपा का पुरस्कार हो। हाल में घोषित 7 राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची ने कांग्रेस के भीतर वर्षों से पल रहे असंतोष को फिर सतह पर ला दिया है।

सवाल यह नहीं है कि उम्मीदवार योग्य हैं या नहीं। सवाल यह है कि क्या वे कांग्रेस के उस कार्यकर्ता का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसने वर्षों तक सड़क पर संघर्ष किया, चुनाव लड़ा, हार झेली और पार्टी का झंडा उठाए रखा? या फिर वे उस राजनीतिक संस्कृति के प्रतिनिधि हैं जिसमें दिल्ली के गलियारों की निकटता, जनता के बीच की स्वीकार्यता पर भारी पड़ जाती है?

कांग्रेस नेतृत्व ने जिन नामों पर मुहर लगाई, उनमें अधिकांश ऐसे चेहरे हैं जिनकी पहचान संगठन विस्तार या जनसंघर्ष से अधिक सत्ता के केंद्रीय ढांचे से जुड़ी रही है। कोई रणनीतिकार रहा, कोई सलाहकार रहा, कोई वर्षों से पार्टी मुख्यालय की राजनीति का हिस्सा रहा। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यही वे चेहरे हैं जो कांग्रेस को पुनर्जीवित करेंगे? क्या यही वे लोग हैं जो बूथ स्तर पर टूट चुके संगठन में नई ऊर्जा भर सकते हैं? विडंबना देखिए कि जिन राज्यों में कांग्रेस का संगठन लगातार कमजोर हुआ, जहां कार्यकर्ता पार्टी छोड़ते रहे, जहां चुनावी हार का सिलसिला नहीं थमा, वहां जिम्मेदारी तय करने के बजाय उन्हीं शक्ति केंद्रों को और मजबूत किया जाता रहा। परिणाम यह हुआ कि पार्टी का समर्पित कार्यकर्ता दर्शक बन गया और निर्णय लेने का अधिकार कुछ चुनिंदा लोगों तक सिमट गया।

आज कांग्रेस में एक अजीब विरोधाभास दिखाई देता है। राहुल गांधी लगातार यात्राएं करते हैं, जनता के बीच जाने की कोशिश करते हैं, लेकिन दूसरी तरफ संगठन में वही पुराने चेहरे निर्णायक भूमिका में बने रहते हैं। एक तरफ जनाधार की बात होती है, दूसरी तरफ टिकट और पद वितरण में जनाधार सबसे कम दिखाई देता है। कभी कांग्रेस में मुख्यमंत्री, सांसद और राष्ट्रीय अध्यक्ष गांवों और जिलों की राजनीति से निकलकर आते थे। आज स्थिति यह है कि अनेक नेता सीधे राष्ट्रीय मंच पर पहुंच जाते हैं, जबकि जमीन पर वर्षों तक काम करने वाले कार्यकर्ता पहचान के लिए भी संघर्ष करते रह जाते हैं। यही कारण है कि कांग्रेस का संगठन लगातार सिकुड़ता गया और क्षेत्रीय दलों ने उसकी राजनीतिक जमीन पर कब्जा कर लिया।

पश्चिम बंगाल में अस्तित्व सीमित

सबसे चिंताजनक बात यह है कि कांग्रेस अब कई राज्यों में मुख्य लड़ाकू दल नहीं बल्कि सहयोगी दल बनती जा रही है। बिहार में वह सहयोगियों पर निर्भर है, उत्तर प्रदेश में उसका आधार नगण्य है, पश्चिम बंगाल में उसका अस्तित्व सीमित है और दक्षिण भारत के बाहर उसकी स्थिति लगातार कमजोर हुई है। इसके बावजूद पार्टी की प्राथमिकताएं संगठन निर्माण से अधिक शक्ति संतुलन साधने में दिखाई देती हैं। यही वजह है कि विरोधी दल कांग्रेस को अक्सर “पुच्छल्ला दल” कहकर निशाना बनाते हैं। यह आरोप राजनीतिक हो सकता है, लेकिन इसके पीछे मौजूद वास्तविकता को कांग्रेस नेतृत्व नजरअंदाज नहीं कर सकता। जिस दल ने कभी राष्ट्रीय राजनीति को दिशा दी, वह आज कई राज्यों में दूसरों की रणनीति का अनुसरण करता दिखाई देता है।

राज्यसभा की ताजा सूची ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि कांग्रेस अभी भी बीमारी का इलाज खोजने के बजाय लक्षणों को छिपाने में व्यस्त है। जब तक पार्टी संघर्ष, संगठन और जनाधार को पुरस्कार देने की संस्कृति विकसित नहीं करेगी, तब तक संसद में सीटें बढ़ भी जाएं तो राजनीतिक प्रभाव नहीं बढ़ेगा। कांग्रेस के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न भाजपा नहीं है। सबसे बड़ा प्रश्न स्वयं कांग्रेस है। क्या वह कार्यकर्ता आधारित दल बनेगी या दरबार आधारित व्यवस्था बनी रहेगी? राज्यसभा की यह सूची उसी प्रश्न को और अधिक तीखे ढंग से देश के सामने रखती है।

सार्वजनिक मंचों पर प्रश्न ?

मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस अध्यक्ष हैं और राज्यसभा में विपक्ष के नेता भी। उनका नाम सूची में होना राजनीतिक रूप से स्वाभाविक माना जा सकता है। लेकिन असली विवाद उनके साथ शामिल अन्य नामों को लेकर है। पवन खेड़ा पार्टी के मीडिया विभाग का चेहरा हैं। टीवी बहसों और प्रेस वार्ताओं में उनकी सक्रियता दिखाई देती है, लेकिन कांग्रेस के भीतर यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या मीडिया प्रबंधन ही अब राज्यसभा की सबसे बड़ी योग्यता बन गई है? कर्नाटक से राज्यसभा भेजे जाने पर सामाजिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को लेकर भी बहस शुरू हो गई है। सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या कांग्रेस के पास कर्नाटक में ऐसे नेता नहीं बचे जो राज्य का प्रतिनिधित्व कर सकें।

तमिलनाडु से प्रवीण चक्रवर्ती का चयन भी कई सवाल खड़े करता है। वह कांग्रेस के डाटा एनालिटिक्स और प्रोफेशनल्स विंग के प्रमुख हैं। संगठन के भीतर उनकी पहचान चुनावी रणनीति और आंकड़ों के विशेषज्ञ के रूप में है। लेकिन जब कांग्रेस लगातार चुनाव हार रही हो, तब रणनीतिकारों को पुरस्कृत करने का संदेश कार्यकर्ताओं तक क्या जाएगा? झारखंड से प्रणव झा का नाम और भी दिलचस्प है, सार्वजनिक रूप से उनकी पहचान कांग्रेस अध्यक्ष के निकट सहयोगी के रूप में अधिक रही है। ऐसे में यह धारणा मजबूत होती है कि पार्टी में संघर्ष से ज्यादा निकटता का महत्व बढ़ गया है।

मध्य प्रदेश से मीनाक्षी नटराजन निस्संदेह लंबे समय से कांग्रेस की सक्रिय नेता रही हैं और लोकसभा का अनुभव भी रखती हैं। लेकिन सवाल फिर वही है कि क्या कांग्रेस नए सामाजिक नेतृत्व को आगे ला रही है या बार-बार सीमित दायरे के चेहरों पर भरोसा कर रही है? राजस्थान से नीरज डांगी को पुनः मौका दिया गया है। यह कांग्रेस नेतृत्व के भरोसे का संकेत हो सकता है, लेकिन पार्टी के भीतर ऐसे नेताओं की भी कमी नहीं है जो वर्षों से संगठन में काम कर रहे हैं और अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं।सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि कांग्रेस आखिर किस दिशा में बढ़ रही है। एक ओर राहुल गांधी लगातार संगठन को जनता से जोड़ने की बात करते हैं, दूसरी ओर राज्यसभा की सूची यह संदेश देती है कि पार्टी अभी भी दिल्ली-केंद्रित राजनीतिक संस्कृति से बाहर निकलने को तैयार नहीं है।

कभी कांग्रेस वह पार्टी थी जहां पंचायत से संसद तक का रास्ता खुला था। आज स्थिति यह है कि कार्यकर्ता संघर्ष करता है, चुनाव लड़ता है, हारता है, संगठन संभालता है, लेकिन पुरस्कार किसी रणनीतिकार, प्रवक्ता, सलाहकार या शीर्ष नेतृत्व के करीबी को मिल जाता है। यही वह संस्कृति है जिसने कांग्रेस को धीरे-धीरे जनाधार वाली पार्टी से दरबार आधारित पार्टी में बदल दिया है। राजनीति में हार-जीत आती रहती है, लेकिन जब संगठन का कार्यकर्ता यह मानने लगे कि उसकी मेहनत और पार्टी के निर्णयों के बीच कोई संबंध नहीं बचा है, तब संकट केवल चुनावी नहीं बल्कि अस्तित्व का हो जाता है। कांग्रेस आज उसी मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है।

राज्यसभा की यह सूची केवल सात नामों की सूची नहीं है। यह कांग्रेस की वर्तमान राजनीतिक सोच का दस्तावेज है। एक ऐसी सोच, जिसमें संघर्ष से अधिक संपर्क, जनाधार से अधिक निकटता और संगठन से अधिक दरबार की अहमियत दिखाई देती है।यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो कांग्रेस संसद में सीटें तो जुटा सकती है, लेकिन जनता के बीच अपना खोया हुआ विश्वास वापस नहीं पा सकेगी। और तब देश की सबसे पुरानी पार्टी का सबसे बड़ा संकट भाजपा नहीं, बल्कि उसका अपना राजनीतिक चरित्र होगा।

 

डिस्क्लेमर:
यह लेख रितेश सिन्हा के व्यक्तिगत विचार, विश्लेषण और समसामयिक आर्थिक परिस्थितियों की उनकी समझ पर आधारित है। लेख में व्यक्त मत आवश्यक नहीं कि किसी समाचार संस्था, संगठन या प्रकाशक के आधिकारिक विचार हों। इसमें उल्लिखित तथ्य, टिप्पणियां और विश्लेषण सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध सूचनाओं, सरकारी बयानों तथा मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं। लेख का उद्देश्य केवल जनचर्चा और विषय पर विमर्श को बढ़ावा देना है।

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