बिहार की शिक्षा में विस्तार, गुणवत्ता की अग्निपरीक्षा: 211 नए कॉलेज, 2,451 शिक्षक और 700 मॉडल स्कूल

admin
12 Min Read
211 नए कॉलेज, 2,451 सहायक प्राध्यापक और 700 मॉडल स्कूल—बिहार की शिक्षा व्यवस्था के विस्तार के साथ अब सबसे बड़ा सवाल गुणवत्ता और परिणाम का है।

बिहार की शिक्षा में विस्तार, गुणवत्ता की अग्निपरीक्षा

211 नए कॉलेज, 2,451 शिक्षक और 700 मॉडल स्कूल

रितेश सिन्हा। बिहार में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक साथ 211 नए डिग्री कॉलेजों की शुरुआत और 2,451 नवनियुक्त सहायक प्राध्यापकों के उन्मुखीकरण कार्यक्रम को निश्चित रूप से एक बड़े कदम के रूप में देखा जाना चाहिए। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बापू सभागार में आयोजित कार्यक्रम में जिस तरह शिक्षा को बिहार के भविष्य से जोड़ा, उससे सरकार की प्राथमिकता स्पष्ट दिखाई देती है। लेकिन बिहार की शिक्षा व्यवस्था के सामने असली चुनौती कॉलेजों की संख्या बढ़ाने से कहीं बड़ी है। सवाल यह है कि क्या इन नए कॉलेजों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को वास्तव में ऐसी शिक्षा मिलेगी, जो उन्हें रोजगार, प्रतियोगिता और बदलती अर्थव्यवस्था के लिए तैयार कर सके?

सरकार का दावा है कि बिहार देश का पहला राज्य बन गया है, जिसने एक ही दिन में 211 डिग्री कॉलेजों की शुरुआत की। आंकड़ा निश्चित रूप से प्रभावशाली है। 2,451 नए सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति भी उच्च शिक्षा में मानव संसाधन की कमी को दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकती है। लेकिन किसी भी शिक्षा व्यवस्था की सफलता का मूल्यांकन केवल संस्थानों और नियुक्तियों की संख्या से नहीं किया जा सकता। असली कसौटी यह होगी कि इन कॉलेजों में कितने विद्यार्थी नियमित रूप से पहुंचते हैं, उन्हें कितने घंटे गुणवत्तापूर्ण शिक्षण मिलता है, पुस्तकालय और प्रयोगशालाएं किस स्थिति में हैं तथा पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके सामने रोजगार और उच्च शिक्षा के कितने अवसर खुलते हैं।

मुख्यमंत्री ने स्वयं नए प्राध्यापकों से विद्यार्थियों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करने की अपील की है। यही बात इस पूरे अभियान की सबसे महत्वपूर्ण कमजोरी की ओर भी संकेत करती है। यदि कॉलेज खुल जाएं, शिक्षक नियुक्त हो जाएं, भवन तैयार हो जाएं, लेकिन विद्यार्थी नियमित कक्षा में न आएं तो केवल संस्थागत विस्तार से शिक्षा की गुणवत्ता नहीं सुधर सकती। बिहार में लंबे समय से उच्च शिक्षा के सामने नियमित कक्षाएं, परीक्षा व्यवस्था, शैक्षणिक अनुशासन, आधारभूत सुविधाएं और रोजगारपरक शिक्षा जैसी चुनौतियां रही हैं। इसलिए नए कॉलेजों की घोषणा के साथ इन समस्याओं के समाधान की ठोस निगरानी व्यवस्था भी आवश्यक होगी।

बिहार की शिक्षा का इतिहास गौरवशाली रहा है। नालंदा और विक्रमशिला जैसी संस्थाओं ने कभी पूरी दुनिया में ज्ञान की पहचान बनाई थी। आज उसी बिहार को यह साबित करना होगा कि वह केवल अपने अतीत की उपलब्धियों का उल्लेख करने वाला राज्य नहीं, बल्कि आधुनिक ज्ञान अर्थव्यवस्था में नेतृत्व करने की क्षमता रखने वाला प्रदेश है। इसके लिए केवल भवन और नियुक्तियां पर्याप्त नहीं होंगी। उच्च शिक्षा को शोध, नवाचार, तकनीक, उद्योग, कौशल विकास और रोजगार से जोड़ना होगा।

सरकार द्वारा 700 सरस्वती विद्या निकेतन मॉडल स्कूल विकसित करने की योजना भी इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा बताई जा रही है। इन स्कूलों में नीट और जेईई जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, सीधी कक्षाएं और चौबीसों घंटे ऑनलाइन ट्यूटर जैसी सुविधाओं की बात कही गई है। यह पहल उन विद्यार्थियों के लिए उपयोगी हो सकती है, जो महंगे निजी संस्थानों की कोचिंग का खर्च नहीं उठा सकते। लेकिन यहां भी सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि डिजिटल शिक्षा केवल घोषणा बनकर न रह जाए।

बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की उपलब्धता, उपकरणों की पहुंच, बिजली की निरंतरता और विद्यार्थियों की डिजिटल क्षमता अलग-अलग स्तर पर है। ऐसे में चौबीसों घंटे ऑनलाइन ट्यूटर की व्यवस्था तभी प्रभावी होगी, जब विद्यार्थी उसके वास्तविक उपयोग में सक्षम हों। केवल तकनीक उपलब्ध करा देना डिजिटल शिक्षा नहीं है। तकनीक के साथ प्रशिक्षित शिक्षक, स्थानीय स्तर पर सहायता और नियमित मूल्यांकन भी जरूरी है।

इसके अलावा शिक्षा को केवल नीट और जेईई जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं तक सीमित करना भी उचित नहीं होगा। हर विद्यार्थी डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बन सकता और न ही हर विद्यार्थी का भविष्य केवल सरकारी नौकरी में है। बिहार के युवाओं के लिए कृषि तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सूचना प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा, विनिर्माण, पर्यटन, वित्तीय सेवाओं, उद्यमिता और नए कौशल आधारित क्षेत्रों में भी रास्ते खोलने होंगे। यदि शिक्षा व्यवस्था केवल कुछ पारंपरिक प्रतियोगी परीक्षाओं पर केंद्रित रही तो राज्य की विशाल युवा आबादी की वास्तविक क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पाएगा।

मुख्यमंत्री ने 100 प्राध्यापकों को ऑक्सफोर्ड तथा अन्य प्रतिष्ठित वैश्विक संस्थानों में प्रशिक्षण दिलाने की बात भी कही है। यह प्रस्ताव स्वागत योग्य है। लेकिन इस योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि विदेश से प्रशिक्षण लेकर लौटने वाले शिक्षक उस ज्ञान को बिहार की शिक्षा व्यवस्था में किस तरह लागू करते हैं। यदि यह प्रशिक्षण केवल प्रमाणपत्र हासिल करने तक सीमित रहा तो सरकारी खर्च का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाएगा। बेहतर होगा कि चयनित प्राध्यापकों के लिए स्पष्ट परिणाम आधारित योजना बनाई जाए और उनसे लौटने के बाद प्रशिक्षण मॉड्यूल, शोध परियोजनाएं और नए शिक्षण मॉडल विकसित कराने की जिम्मेदारी तय की जाए।

शिक्षा पर राज्य के कुल बजट का 21 प्रतिशत खर्च किए जाने की बात भी महत्वपूर्ण है। लेकिन यहां भी एक बुनियादी सवाल उठता है—बजट में आवंटन और जमीन पर परिणाम में कितना अंतर है? शिक्षा पर अधिक पैसा खर्च करना आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है कि वह पैसा सही स्थान पर और सही समय पर खर्च हो। भवन निर्माण, उपकरण खरीद, वेतन और प्रशासनिक खर्च के साथ शिक्षा की गुणवत्ता, शोध, प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों और विद्यार्थियों की सहायता सेवाओं पर भी पर्याप्त ध्यान देना होगा।

बिहार में बड़ी संख्या में युवा उच्च शिक्षा के लिए दूसरे राज्यों का रुख करते हैं। इसका एक कारण केवल कॉलेजों की कमी नहीं, बल्कि गुणवत्ता का अंतर भी है। यदि बिहार में नए कॉलेजों के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षक, आधुनिक पाठ्यक्रम, बेहतर प्रयोगशालाएं, डिजिटल संसाधन और रोजगार से जुड़े पाठ्यक्रम उपलब्ध कराए जाएं तो राज्य से होने वाला युवा पलायन काफी हद तक कम किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए सरकार को आंकड़ों के आधार पर हर वर्ष यह बताना होगा कि नई संस्थाओं से वास्तव में कितना बदलाव आया।

211 नए कॉलेजों के संचालन के साथ एक और महत्वपूर्ण प्रश्न वित्तीय स्थिरता का है। शुरुआती चरण में भवन, उपकरण और मानव संसाधन के लिए बजट उपलब्ध कराया जाना एक बात है, लेकिन आने वाले वर्षों में इन संस्थानों को लगातार पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराना दूसरी बात। यदि कुछ वर्षों बाद बजट का दबाव बढ़ा और कॉलेजों में शिक्षकों, उपकरणों या प्रयोगशालाओं की कमी होने लगी तो वर्तमान विस्तार का उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है।

अब बिहार को घोषणा आधारित शिक्षा नीति से परिणाम आधारित शिक्षा नीति की ओर बढ़ना होगा। प्रत्येक नए कॉलेज के लिए न्यूनतम आधारभूत मानक तय होने चाहिए। कितने शिक्षक होंगे, कितने विद्यार्थी होंगे, पुस्तकालय में कितनी किताबें होंगी, प्रयोगशालाएं कितनी सक्रिय होंगी, डिजिटल सुविधाएं कैसी होंगी और विद्यार्थियों की उपस्थिति कितनी होगी—इन सभी का सार्वजनिक मूल्यांकन होना चाहिए।

नवनियुक्त 2,451 सहायक प्राध्यापक इस बदलाव की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। मुख्यमंत्री ने उन्हें केवल विषय पढ़ाने वाला शिक्षक नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व, सोच और भविष्य निर्माण की जिम्मेदारी निभाने वाला मार्गदर्शक बताया है। यही भूमिका उच्च शिक्षा को नई दिशा दे सकती है। शिक्षक यदि केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित रहेंगे तो बदलाव सीमित रहेगा। लेकिन यदि वे विद्यार्थियों में सवाल पूछने, शोध करने, नवाचार करने और नई संभावनाएं तलाशने की संस्कृति विकसित करेंगे तो यही कॉलेज बिहार के सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के केंद्र बन सकते हैं।

बिहार के युवाओं में प्रतिभा की कमी नहीं है। समस्या अक्सर अवसर, संसाधन और सही मार्गदर्शन की रही है। ऐसे में सरकार द्वारा उच्च शिक्षा के विस्तार का निर्णय महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे सफलता की मंजिल समझना जल्दबाजी होगी। यह केवल शुरुआत है।

अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि 211 नए कॉलेजों को केवल संख्या न बनने दिया जाए। 2,451 शिक्षक केवल नियुक्ति का आंकड़ा न रहें। 700 मॉडल स्कूल केवल सरकारी योजनाओं की सूची में दर्ज नाम न बनें और शिक्षा के लिए बजट का 21 प्रतिशत आवंटन केवल एक प्रभावशाली आंकड़ा बनकर न रह जाए।

बिहार की शिक्षा व्यवस्था को अब परिणाम देने होंगे। कितने विद्यार्थियों ने बेहतर शिक्षा प्राप्त की, कितनों को रोजगार मिला, कितनों ने शोध और नवाचार में कदम रखा, कितने युवाओं ने अपना उद्यम शुरू किया और कितने विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिए बिहार छोड़ने के बजाय बिहार में ही बेहतर अवसर पा सके—इन सवालों के जवाब ही आने वाले वर्षों में सरकार के शिक्षा मॉडल की वास्तविक सफलता तय करेंगे।

नालंदा और विक्रमशिला की विरासत का उल्लेख करना आसान है, लेकिन उस स्तर की ज्ञान-परंपरा को आधुनिक संदर्भ में पुनर्जीवित करना कठिन काम है। बिहार ने कॉलेजों की संख्या बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम जरूर उठाया है। अब अगली परीक्षा गुणवत्ता की है। विस्तार से व्यवस्था बन सकती है, लेकिन गुणवत्ता से ही शिक्षा व्यवस्था की पहचान बनती है। यही वह कसौटी है जिस पर बिहार की नई शिक्षा पहल को आने वाले वर्षों में परखा जाएगा।

 

डिस्क्लेमर: यह लेख रितेश सिन्हा के व्यक्तिगत विचार, विश्लेषण और समसामयिक आर्थिक परिस्थितियों की उनकी समझ पर आधारित है। लेख में व्यक्त मत आवश्यक नहीं कि किसी समाचार संस्था, संगठन या प्रकाशक के आधिकारिक विचार हों। इसमें उल्लिखित तथ्य, टिप्पणियां और विश्लेषण सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध सूचनाओं, सरकारी बयानों तथा मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं। लेख का उद्देश्य केवल जनचर्चा और विषय पर विमर्श को बढ़ावा देना है।

Share This Article
Leave a Comment