गंडक की सरकारी जमीन पर कब्जे का आरोप, प्रशासन की कार्रवाई पर बड़ा सवाल!

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मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के दावों की जमीनी परीक्षा, सीओ के रोकने के बाद फिर काम शुरू, राजद भी मौन

रितेश सिन्हा नई दिल्ली।  बिहार में सरकारी जमीन को अतिक्रमण से मुक्त कराने के दावों के बीच बनियापुर जिला छपरा, बिहार से सामने आई एक शिकायत ने सरकार और प्रशासन दोनों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को भेजी गई शिकायत में गंडक नदी से जुड़ी सरकारी जमीन पर कथित अतिक्रमण और निर्माण कार्य का आरोप लगाया गया है। शिकायतकर्ता के मुताबिक स्थानीय प्रशासन को सूचना दी गई, अधिकारी मौके पर पहुंचे और काम रोकने का निर्देश दिया गया, लेकिन कुछ दिनों बाद कथित तौर पर फिर निर्माण शुरू हो गया।

प्रशासन की कार्रवाई पर बड़ा सवाल

मामले का सबसे गंभीर पहलू यही है कि यदि शिकायत में लगाए गए आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो सवाल केवल अतिक्रमण करने वालों पर नहीं, बल्कि प्रशासन की कार्रवाई की प्रभावशीलता पर भी उठेगा। आखिर ऐसा क्या हुआ कि अधिकारी मौके पर पहुंचे, काम रोकने की बात हुई और उसके बाद भी कथित गतिविधि दोबारा शुरू हो गई? क्या केवल मौके पर पहुंचकर चेतावनी देना ही प्रशासन की कार्रवाई है? क्या कोई लिखित आदेश जारी हुआ? क्या जमीन की तत्काल पैमाइश और सीमांकन कराया गया?

सीओ के रोकने के बाद फिर काम शुरू होने का आरोप

शिकायत में दावा किया गया है कि अंचल स्तर के अधिकारी मौके पर पहुंचे और काम रोकने को कहा गया। इसके बावजूद दोबारा काम शुरू होने की बात कही गई है। शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि बाद में दिन-रात निर्माण कार्य चलता रहा। इन आरोपों की स्वतंत्र प्रशासनिक जांच जरूरी है, लेकिन यदि प्रशासन स्वयं इस शिकायत की पुष्टि करता है तो यह सवाल बेहद गंभीर होगा कि सरकारी जमीन पर सरकारी आदेश का असर आखिर कितने घंटे या कितने दिनों तक रहता है?

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सामने प्रशासनिक सवाल

मामला मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बिहार सरकार की आधिकारिक वेबसाइट पर उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में दर्ज किया गया है। इससे पहले दिसंबर 2025 में सम्राट चौधरी ने सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई जारी रखने की बात कही थी और शिकायत मिलने पर कार्रवाई का आश्वासन दिया था। अब मुख्यमंत्री के सामने बनियापुर, छपरा की यह शिकायत एक सीधा प्रशासनिक सवाल बनकर खड़ी है—शिकायत मिली है तो कार्रवाई का अंतिम परिणाम क्या है?

भूमि दस्तावेज और नक्शे की जांच जरूरी

शिकायत के साथ भूमि से संबंधित नक्शे और राजस्व दस्तावेज भी लगाए गए हैं। दस्तावेजों में संबंधित भूखंडों को चिह्नित किया गया है। हालांकि इन दस्तावेजों की अंतिम वैधानिक पुष्टि राजस्व विभाग और सक्षम प्रशासनिक अधिकारियों की जांच से ही हो सकती है। लेकिन यही वह बिंदु है जहां सरकार को चुप रहने के बजाय दस्तावेजों की जांच कर स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए।

राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग से भी सवाल

सवाल केवल मुख्यमंत्री से नहीं है। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग तथा जिला प्रशासन को भी बताना होगा कि संबंधित जमीन का सरकारी अभिलेख क्या कहता है? जमीन की वर्तमान स्थिति क्या है? उसका सीमांकन कब हुआ? यदि अतिक्रमण मिला तो उसे हटाने की कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि शिकायत गलत है तो प्रशासन तथ्य और अभिलेख सार्वजनिक करके विवाद खत्म क्यों नहीं करता?

राजद की भूमिका पर भी सवाल

इस पूरे मामले में विपक्ष की भूमिका पर भी सवाल उठता है। लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाली राजद खुद अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर ‘जनता की बात सुनी जाए, प्रशासन जवाबदेह और पारदर्शी हो’ तथा भ्रष्टाचार और अपराध पर कार्रवाई को अपने प्रमुख मुद्दों में रखती है। ऐसे में बनियापुर, छपरा की इस शिकायत पर राजद की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आती तो सवाल बनता है—सरकारी जमीन के इस कथित विवाद पर विपक्ष की आवाज कहां है?राजद के सामने भी जवाबदेही का सवाल

राजद के लिए भी यह जवाब देने का मौका है कि क्या वह मामले की स्वतंत्र जांच की मांग करेगी? क्या उसके स्थानीय नेता प्रशासन से रिपोर्ट मांगेंगे? क्या पार्टी यह जानना चाहेगी कि शिकायत में लगाए गए आरोप सही हैं या नहीं? राजनीतिक दलों से अपेक्षा केवल सत्ता में रहते हुए नहीं, विपक्ष में रहते हुए भी प्रशासनिक जवाबदेही तय कराने की होती है।

सरकारी जमीन पर कथित अतिक्रमण को लेकर सबसे बड़ा सवाल

सबसे बड़ा सवाल फिर मुख्यमंत्री और प्रशासन के सामने है। यदि जमीन सरकारी है तो कथित अतिक्रमण हटाने में देरी क्यों? यदि जमीन सरकारी नहीं है तो शिकायत की स्थिति साफ करने में देरी क्यों? दोनों परिस्थितियों में चुप्पी सवाल पैदा करती है।

गंडक नदी से जुड़ी जमीन होने के कारण बढ़ी गंभीरता

गंडक नदी से जुड़ी जमीन होने के कारण मामले की गंभीरता और बढ़ जाती है। यहां जमीन की प्रकृति, नदी क्षेत्र, राजस्व अभिलेख और प्रशासनिक सीमांकन—सबकी स्पष्ट जांच आवश्यक है। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सक्षम विभागों को मौके का निरीक्षण और रिकॉर्ड का सत्यापन करना चाहिए।

अब बयान नहीं, कार्रवाई की रिपोर्ट चाहिए

अब इस मामले में सिर्फ बयान नहीं, कार्रवाई की रिपोर्ट चाहिए। मुख्यमंत्री कार्यालय को बताना चाहिए कि शिकायत पर किस अधिकारी को जांच सौंपी गई, जिलाधिकारी और अंचलाधिकारी ने क्या रिपोर्ट दी और जमीन की वास्तविक स्थिति क्या निकली। यदि आरोप गलत हैं तो सरकार सामने आकर उन्हें खारिज करे। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो कानून के मुताबिक कार्रवाई हो।

क्योंकि असली सवाल यही है—जब सरकारी जमीन पर कथित अतिक्रमण की शिकायत मुख्यमंत्री तक पहुंच जाए, अधिकारी मौके पर पहुंचकर काम रोक दें और फिर भी कथित तौर पर काम दोबारा शुरू हो जाए, तो आखिर प्रशासन की पकड़ कहां कमजोर पड़ रही है? और जिस ‘सुशासन’ में सरकारी जमीन की रक्षा का दावा किया जाता है, उसकी असली परीक्षा अब छपरा में होनी है।

 

डिस्क्लेमर: यह लेख रितेश सिन्हा के व्यक्तिगत विचार, विश्लेषण और समसामयिक आर्थिक परिस्थितियों की उनकी समझ पर आधारित है। लेख में व्यक्त मत आवश्यक नहीं कि किसी समाचार संस्था, संगठन या प्रकाशक के आधिकारिक विचार हों। इसमें उल्लिखित तथ्य, टिप्पणियां और विश्लेषण सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध सूचनाओं, सरकारी बयानों तथा मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं। लेख का उद्देश्य केवल जनचर्चा और विषय पर विमर्श को बढ़ावा देना है।

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