सेबी के गंभीर आरोपों के बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण सहित पूरे निगरानी तंत्र पर उठे सवाल, आखिर इतने वर्षों तक किसी को क्यों नहीं दिखी कथित गड़बड़ी?
रितेश सिन्हा दिल्ली। हर्षद मेहता प्रकरण के बाद देश से वादा किया गया था कि वित्तीय बाजारों की निगरानी को अभेद्य बनाया जाएगा। फिर केतन पारेख आया, फिर सत्यम का प्रकरण सामने आया, फिर नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे मामले सुर्खियों में रहे। हर बार दावा किया गया कि सबक सीख लिया गया है, व्यवस्था मजबूत हो गई है और अब कोई बड़ी वित्तीय गड़बड़ी निगरानी तंत्र की आंखों से बच नहीं पाएगी। लेकिन राजेश एक्सपोर्ट्स को लेकर सेबी द्वारा लगाए गए आरोपों ने एक बार फिर उन दावों की बुनियाद को चुनौती दे दी है।
देश की पूंजी बाजार नियामक संस्था सेबी ने राजेश एक्सपोर्ट्स और उसके अध्यक्ष राजेश मेहता के खिलाफ अंतरिम आदेश जारी करते हुए आरोप लगाया है कि वित्तीय विवरणों, राजस्व प्रस्तुतीकरण, संबंधित पक्षों से लेनदेन और धन के प्रवाह को लेकर गंभीर अनियमितताओं के संकेत मिले हैं। सेबी का दावा है कि वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच लगभग ₹15.15 लाख करोड़ के राजस्व को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया हो सकता है। यह राशि कंपनी द्वारा दिखाए गए कुल समेकित राजस्व का लगभग 99.8 प्रतिशत बताई गई है।
यदि सेबी के आरोपों में दम है तो यह केवल किसी एक कंपनी का मामला नहीं है। यह भारतीय वित्तीय निगरानी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न है। आखिर एक सूचीबद्ध कंपनी, जिसके वित्तीय परिणाम सार्वजनिक हों, जिसके खातों का लेखा परीक्षण होता हो, जिसमें बड़े संस्थागत निवेशक शामिल हों और जो लगातार नियामकीय निगरानी के दायरे में हो, उसके बारे में इतने गंभीर सवाल वर्षों बाद क्यों उठे?
सबसे असहज प्रश्न यह है कि जब कथित तौर पर ₹15.15 लाख करोड़ के राजस्व को लेकर संदेह पैदा हो सकता है, तब इतने वर्षों तक बाकी संस्थाएं क्या कर रही थीं? क्या किसी को कोई संकेत नहीं मिला? क्या किसी ने कोई चेतावनी नहीं दी? या फिर चेतावनियों को नजरअंदाज किया गया?
सेबी के आदेश के अनुसार कंपनी की अधिकांश आय विदेशी इकाइयों, विशेष रूप से स्विट्ज़रलैंड स्थित इकाई से जुड़ी दिखाई गई। नियामक का कहना है कि जांच के दौरान इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि करने में गंभीर कठिनाइयां सामने आईं और आवश्यक सूचनाएं उपलब्ध कराने में भी सहयोग नहीं मिला।
सवाल केवल राजेश मेहता या राजेश एक्सपोर्ट्स तक सीमित नहीं, सवाल उन संस्थाओं तक पहुंचता है जिन्हें देश के वित्तीय बाजारों का पहरेदार माना जाता है। यदि कोई कंपनी वर्षों तक निवेशकों के सामने एक वित्तीय तस्वीर पेश करती रही और बाद में उस तस्वीर की विश्वसनीयता पर इतने बड़े सवाल खड़े हो जाते हैं, तो जिम्मेदारी केवल कंपनी प्रबंधन की नहीं हो सकती।
इस मामले ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की भूमिका को लेकर भी बहस छेड़ दी है। यह सही है कि सेबी एक स्वायत्त संस्था है, लेकिन देश की वित्तीय व्यवस्था की राजनीतिक जवाबदेही अंततः सरकार और वित्त मंत्रालय पर ही आती है। जब सरकार यह दावा करती है कि उसने निगरानी तंत्र को तकनीक और आंकड़ों की शक्ति से सुसज्जित कर दिया है, तब यह पूछना भी स्वाभाविक हो जाता है कि फिर इतनी बड़ी कथित विसंगतियों का पता समय रहते क्यों नहीं चल पाया।
मोदी सरकार लगातार यह कहती रही है कि देश में पारदर्शिता बढ़ी है, शेल कंपनियों पर कार्रवाई हुई है, डिजिटल निगरानी मजबूत हुई है और वित्तीय अपराधों पर नकेल कसी गई है। यदि यह सब सही है, तो फिर इस मामले में व्यवस्था की आंखें इतनी देर तक बंद क्यों रहीं? और यदि कहीं चूक हुई है, तो उसकी जवाबदेही कौन लेगा?
सेबी के आदेश में केवल राजस्व से जुड़े सवाल ही नहीं उठाए गए हैं। नियामक ने धन के कथित प्रवाह, कंपनी और प्रवर्तक समूह से जुड़े लेनदेन तथा कंपनी के वित्तीय ब्योरे की विश्वसनीयता पर भी गंभीर टिप्पणियां की हैं। सेबी ने नए फोरेंसिक ऑडिट का निर्देश दिया है और राष्ट्रीय वित्तीय प्रतिवेदन प्राधिकरण को भी लेखा परीक्षकों की भूमिका की जांच के लिए आदेश की प्रति भेजी है।
यहां एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है। यदि लेखा परीक्षक, निदेशक मंडल, लेखा समिति, संस्थागत निवेशक, शेयर बाजार और नियामकीय तंत्र मौजूद थे, तो फिर चेतावनी की घंटी सबसे पहले किसे बजानी चाहिए थी? क्या पूरे तंत्र ने एक साथ विफलता दिखाई? यदि नहीं, तो चूक कहां हुई?
मामले की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सेबी ने राजेश मेहता को कंपनी की प्रतिभूतियों में कारोबार करने से रोकने जैसी अंतरिम कार्रवाई भी की है। आदेश के सार्वजनिक होने के बाद कंपनी के शेयरों में तेज गिरावट दर्ज की गई, जिससे निवेशकों की चिंता और बढ़ गई।
हालांकि इस कहानी का दूसरा पक्ष भी है। राजेश एक्सपोर्ट्स और राजेश मेहता ने सेबी के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि कंपनी द्वारा घोषित राजस्व सही है और सेबी ने तथ्यों की गलत व्याख्या की है। कंपनी का कहना है कि अंतिम निष्कर्ष आने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।
यही कारण है कि इस मामले में किसी को दोषी ठहराना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन सरकार, नियामकों और निगरानी तंत्र से सवाल पूछना बिल्कुल भी जल्दबाजी नहीं है।
दरअसल इस पूरे प्रकरण का सबसे चिंताजनक पहलू यह नहीं है कि सेबी ने आरोप लगाए हैं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि एक शेयरधारक की शिकायत से शुरू हुई जांच ने इतने बड़े प्रश्न खड़े कर दिए। यदि एक सामान्य निवेशक की शिकायत से ऐसी तस्वीर सामने आ सकती है, तो फिर उन संस्थाओं की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है जिनके पास कहीं अधिक अधिकार, संसाधन और जानकारी उपलब्ध होती है।
देश के करोड़ों निवेशक यह जानना चाहते हैं कि यदि कथित तौर पर इतनी बड़ी वित्तीय गड़बड़ियों के संकेत मौजूद थे, तो उन्हें समय रहते पकड़ने में व्यवस्था क्यों विफल रही। क्या भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा नहीं होगी, इसकी कोई गारंटी है? क्या वित्त मंत्रालय इस पूरे मामले की स्वतंत्र समीक्षा कराएगा? क्या यह जांच होगी कि नियामकीय स्तर पर चूक कहां हुई? और क्या किसी संस्था या अधिकारी की जवाबदेही तय होगी?
राजेश एक्सपोर्ट्स प्रकरण का अंतिम सच अदालतों और जांच एजेंसियों के सामने आएगा। लेकिन एक प्रश्न आज भी देश के सामने खड़ा है—यदि ₹15.15 लाख करोड़ के कथित खेल पर देश की सर्वोच्च नियामक संस्था को हस्तक्षेप करना पड़ा, तो इतने वर्षों तक बाकी व्यवस्था क्या कर रही थी?
क्योंकि किसी भी लोकतंत्र में सबसे बड़ा संकट केवल वित्तीय अनियमितता नहीं होती। सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है जब इतने बड़े सवालों के बाद भी जवाबदेही का चेहरा दिखाई नहीं देता। और यदि इस मामले में भी जवाबदेही धुंध में खो गई, तो कटघरे में केवल एक कारोबारी या एक कंपनी नहीं, बल्कि पूरी वित्तीय निगरानी व्यवस्था खड़ी दिखाई देगी।

