1974 की तरह फिर उबल रहा है युवा आक्रोश या सत्ता और विपक्ष दोनों अपने-अपने स्वार्थ साध रहे हैं?
- राजनीति फिर युवाओं के कंधों पर अपना भविष्य तलाश रही है
- बेरोजगारों की बढ़ती फौज, नेतृत्वविहीन छात्र आक्रोश और सत्ता-विपक्ष दोनों के सामने सबसे बड़ा सवाल
दिल्ली- जंतर-मंतर बना युवाओं के आक्रोश का प्रतीक- दिल्ली का जंतर-मंतर आज केवल एक प्रदर्शन स्थल नहीं है। यह उस पीढ़ी की बेचैनी का प्रतीक बन चुका है जिसने वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की, परिवार की उम्मीदों का बोझ उठाया, लेकिन बदले में उसे प्रश्नपत्र लीक, रुकी हुई भर्तियां, लंबी न्यायिक प्रक्रियाएं और अनिश्चित भविष्य मिला। यह केवल नीट या किसी एक परीक्षा का आंदोलन नहीं है। यह उस भरोसे का संकट है, जो धीरे-धीरे देश की भर्ती और परीक्षा व्यवस्था से उठता दिखाई दे रहा है।
युवाओं के आंदोलन से उठते राजनीतिक सवाल
इस पूरे आंदोलन का सबसे बड़ा प्रश्न केवल युवाओं का नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति का भी है। आखिर ऐसी स्थिति बनी ही क्यों कि लाखों छात्र सड़कों पर उतरने को मजबूर हो गए? और उससे भी बड़ा प्रश्न—क्या सत्ता और विपक्ष दोनों इस आक्रोश को अपने-अपने राजनीतिक चश्मे से देखने लगे हैं?
केंद्र सरकार की जवाबदेही पर सवाल
सबसे पहला सवाल स्वाभाविक रूप से केंद्र की भाजपा-नीत सरकार से है। एक दशक से अधिक समय तक सत्ता में रहने के बाद यदि भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर बार-बार प्रश्न उठ रहे हैं, यदि प्रश्नपत्र लीक की घटनाएं सार्वजनिक बहस का विषय बन रही हैं, यदि नियुक्तियां वर्षों तक लंबित रहती हैं और करोड़ों युवाओं में भविष्य को लेकर असुरक्षा बढ़ रही है, तो इसकी राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही कौन लेगा? केवल विपक्ष पर दोषारोपण करने से यह प्रश्न समाप्त नहीं होगा।
क्या केवल भाजपा ही कटघरे में है?
क्या केवल भाजपा कटघरे में है? बिल्कुल नहीं। कांग्रेस जो आज युवाओं के पक्ष में सबसे मुखर आवाज बनने का प्रयास करती है, उससे भी सवाल कम नहीं हैं। दशकों तक देश की सत्ता में रहने वाली पार्टी ने ऐसी कौन-सी स्थायी व्यवस्था बनाई थी जिससे भर्ती विवाद और परीक्षा अनियमितताएं पूरी तरह समाप्त हो जातीं? आज उसका विरोध कितना नीतिगत है और कितना राजनीतिक—यह प्रश्न भी जनता पूछ रही है।
विपक्ष की भूमिका और राजनीतिक अवसर
समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों की भूमिका भी जांच के दायरे में है। क्या वे युवाओं के भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं, या इस आंदोलन को केंद्र सरकार के खिलाफ राजनीतिक अवसर के रूप में देख रहे हैं? यदि कल सत्ता उनके हाथ में हो, तो क्या वे ऐसी व्यवस्था की गारंटी देंगे जहां प्रश्नपत्र लीक, वर्षों तक लंबित भर्तियां और प्रशासनिक अव्यवस्था अतीत की बात बन जाएं?
छात्र आंदोलन का मूल उद्देश्य
आंदोलन की सबसे बड़ी विडंबना है, जंतर-मंतर पर बैठा छात्र किसी राजनीतिक दल का झंडा लेकर नहीं बैठा। वह नौकरी, पारदर्शिता और न्याय की मांग लेकर बैठा है। उसके चारों ओर राजनीति अपनी-अपनी गणित बिठाने में लगी दिखाई देती है। सत्ता इसे विपक्ष की राजनीति बताती है, विपक्ष इसे सरकार की विफलता का प्रतीक बताता है। दोनों के बीच छात्र का मूल प्रश्न कहीं खोता जा रहा है।
1974 के छात्र आंदोलन से तुलना
इतिहास गवाह है कि 1974 का छात्र आंदोलन भी शुरुआत में केवल छात्रों की बेचैनी था। बाद में राजनीति उससे जुड़ी और अंततः उसने राष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदल दी। आज परिस्थितियां भिन्न हैं, लेकिन कुछ समानताएं असहज करती हैं—बेरोजगारी, व्यवस्था पर अविश्वास, भर्ती विवाद और युवाओं में बढ़ती निराशा।
नेतृत्वविहीन आंदोलन की चुनौती
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस आंदोलन का अभी तक कोई सर्वमान्य जननेता नहीं है। यह नेतृत्वविहीन आक्रोश है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ा जोखिम भी। जब आंदोलनों का स्पष्ट नेतृत्व नहीं होता, तब अलग-अलग वैचारिक, राजनीतिक और अवसरवादी समूह उनमें प्रभाव स्थापित करने की कोशिश करते हैं। ऐसे समय सबसे अधिक सावधानी स्वयं छात्रों को बरतनी होती है, क्योंकि अंततः सबसे बड़ी कीमत वही चुकाते हैं।
क्या युवाओं का आक्रोश राजनीतिक रूप ले रहा है?
वर्तमान राजनीतिक माहौल इस बहस को और जटिल बनाता है। हाल के वर्षों में भर्ती प्रक्रियाओं, प्रशासनिक कार्यप्रणाली और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर विभिन्न राज्यों में राजनीतिक विवाद लगातार उठते रहे हैं। कई मामलों में जांच और न्यायिक प्रक्रियाएं चल रही हैं। ऐसे वातावरण में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न भी उठता है कि क्या युवाओं का यह आंदोलन केवल उनकी पीड़ा का विस्फोट है, या फिर अलग-अलग राजनीतिक दल इसे अपने-अपने हितों के अनुसार परिभाषित करने का प्रयास कर रहे हैं।
सत्ता और विपक्ष दोनों के सामने बड़ा सवाल
यह आंदोलन सत्ता के लिए एक चुनौती है, निस्संदेह। यह विपक्ष के लिए एक अवसर है, इसमें भी संदेह नहीं। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भाजपा, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और अन्य दल वास्तव में युवाओं की समस्याओं का समाधान चाहते हैं, या वे केवल इस आक्रोश को अपने-अपने राजनीतिक लाभ में बदलना चाहते हैं? यह प्रश्न किसी एक दल से नहीं, पूरे राजनीतिक वर्ग से है।
चुनावी वादे और रोजगार की हकीकत
आज हर दल युवाओं की बात करता है। चुनाव आते हैं तो रोजगार सबसे बड़ा वादा बन जाता है। चुनाव समाप्त होते ही वही युवा भर्ती की प्रतीक्षा में वर्षों तक भटकता है। जब परीक्षा होती है तो उसकी निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं। जब छात्र विरोध करते हैं तो उन्हें कभी विपक्ष का समर्थक, कभी सरकार विरोधी और कभी राजनीतिक मोहरा कह दिया जाता है। लेकिन शायद ही कोई दल यह स्वीकार करता है कि समस्या का स्थायी समाधान केवल भाषणों से नहीं, बल्कि संस्थागत सुधारों से आएगा।
आंदोलन का भविष्य और युवाओं की जिम्मेदारी
यदि यह आंदोलन केवल राजनीतिक बयानबाजी में सिमट गया तो सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं युवाओं का होगा जिनके भविष्य की लड़ाई से इसकी शुरुआत हुई। यदि यह आंदोलन हिंसा, अराजकता या वैचारिक टकराव की दिशा में गया तो उसकी कीमत भी छात्र ही चुकाएंगे। यह जिम्मेदारी केवल सरकार या विपक्ष की नहीं, बल्कि आंदोलन का हिस्सा बने युवाओं की भी है कि वे अपने मूल उद्देश्य से न भटकें।
समाधान की दिशा में बढ़ने की जरूरत
लोकतंत्र में आंदोलन आवश्यक हैं, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है कि आंदोलन समाधान की दिशा में आगे बढ़ें। सरकार को युवाओं के प्रश्नों का उत्तर देना होगा। विपक्ष को केवल आलोचना नहीं, ठोस विकल्प भी देना होगा। और राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि युवा केवल चुनावी भीड़ नहीं हैं; वे भारत के भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी हैं।
जंतर-मंतर से उठता सबसे बड़ा सवाल
आज जंतर-मंतर पर उठ रही आवाजें केवल नियुक्ति पत्र नहीं मांग रहीं। वे व्यवस्था से यह पूछ रही हैं कि मेहनत, योग्यता और ईमानदारी का मूल्य आखिर कब मिलेगा। यह प्रश्न जितना सरकार से है, उतना ही विपक्ष से भी है।
इतिहास से सीखने का समय
यदि सत्ता इस आक्रोश को केवल राजनीति मानकर टाल दे और विपक्ष इसे केवल सत्ता परिवर्तन का अवसर समझे, तो दोनों ही इतिहास से कुछ नहीं सीख रहे। 1974 का आंदोलन भी शुरू में कुछ छात्रों की नाराज़गी भर था। बाद में उसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी।
क्या इतिहास खुद को दोहराएगा?
आज इतिहास खुद को दोहराएगा या नहीं, यह भविष्य बताएगा। लेकिन इतना तय है कि यदि करोड़ों युवाओं के भीतर जमा होती कुंठा, बेरोजगारी और व्यवस्था पर घटते भरोसे का समाधान नहीं हुआ, तो जंतर-मंतर की यह आवाज केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहेगी। तब सवाल किसी एक सरकार या किसी एक विपक्ष का नहीं होगा। सवाल पूरे भारतीय राजनीतिक तंत्र का होगा, जिसने वर्षों तक युवाओं से वादे किए, लेकिन उन्हें भरोसेमंद व्यवस्था देने में सफलता नहीं पाई।
यह लेख रितेश सिन्हा के व्यक्तिगत विचार, विश्लेषण और समसामयिक आर्थिक परिस्थितियों की उनकी समझ पर आधारित है। लेख में व्यक्त मत आवश्यक नहीं कि किसी समाचार संस्था, संगठन या प्रकाशक के आधिकारिक विचार हों। इसमें उल्लिखित तथ्य, टिप्पणियां और विश्लेषण सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध सूचनाओं, सरकारी बयानों तथा मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं। लेख का उद्देश्य केवल जनचर्चा और विषय पर विमर्श को बढ़ावा देना है।