मोदी के सपनों की उड़ान में सबसे बड़ी बाधा बने मांझी और उनके कारिंदे
एमएसएमई मंत्रालय की नाकामी पर सर्वोच्च अदालत का करारा तमाचा
- सर्वोच्च अदालत को देनी पड़ी नसीहत
- मंत्रालय किसकी सेवा में व्यस्त
रितेश सिन्हा- वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र को भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बताते रहे हैं। आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, वोकल फॉर लोकल और विकसित भारत-2047 जैसे लगभग हर बड़े अभियान की सफलता एमएसएमई क्षेत्र की मजबूती पर निर्भर बताई गई है। सरकार के अनुसार देश में 6 करोड़ से अधिक एमएसएमई इकाइयाँ कार्यरत हैं जो करोड़ों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार देती हैं। यदि इन उद्योगों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कानूनी ढांचा ही कमजोर हो तो सरकार की सारी घोषणाएँ केवल भाषण बनकर रह जाती हैं।
सर्वोच्च अदालत की टिप्पणी ने बढ़ाई मंत्रालय की मुश्किलें
सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणी ने पूरे एमएसएमई मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने टाटा स्टील से जुड़े मामले में दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के “क्लीन स्लेट” सिद्धांत को बरकरार रखते हुए स्पष्ट कहा कि मौजूदा कानून एमएसएमई और अन्य छोटे परिचालन ऋणदाताओं के साथ न्याय नहीं कर रहा। इतना ही नहीं, अदालत को स्वयं विधि आयोग और संसद से कानून में संशोधन की सिफारिश करनी पड़ी।
देश की सर्वोच्च अदालत का यह कहना कि एमएसएमई वर्तमान व्यवस्था में “सबसे अधिक वंचित” हैं, अपने आप में अत्यंत गंभीर टिप्पणी है। अदालत ने माना कि छोटे उद्योग भुगतान की प्राथमिकता सूची में सबसे नीचे हैं। परिणामस्वरूप बड़ी कंपनियों के दिवालिया होने की स्थिति में सबसे बड़ा आर्थिक नुकसान उन्हीं छोटे उद्यमियों को उठाना पड़ता है, जिनकी वित्तीय क्षमता सबसे कम होती है।
जीतन राम मांझी और मंत्रालय की जवाबदेही पर सवाल
सवाल केंद्रीय एमएसएमई मंत्री जीतन राम मांझी से है। यदि सर्वोच्च अदालत को स्वयं यह कहना पड़ रहा है कि एमएसएमई हितों की रक्षा के लिए कानून में बदलाव आवश्यक है तो मंत्रालय अब तक क्या कर रहा था? क्या मंत्रालय को वर्षों से यह समस्या दिखाई नहीं दी? क्या छोटे उद्योगों की आवाज मंत्रालय तक कभी पहुँची ही नहीं, या फिर उसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता ही नहीं समझी गई?
सवाल केवल मंत्री तक सीमित नहीं है, मंत्रालय के सचिव, अतिरिक्त सचिव, संयुक्त सचिव, विकास आयुक्त तथा नीति निर्माण से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी भी बराबर जिम्मेदार हैं। उनका दायित्व केवल योजनाओं की समीक्षा बैठकें करना या नई घोषणाएँ करना नहीं है। उनका सबसे बड़ा दायित्व यह सुनिश्चित करना है कि देश के छोटे उद्योगों को नुकसान पहुँचाने वाली कानूनी खामियों की समय रहते पहचान हो और सरकार के समक्ष सुधार के ठोस प्रस्ताव रखे जाएँ।
आईबीसी कानून और एमएसएमई की चुनौतियां
आईबीसी वर्ष 2016 से लागू है। पिछले लगभग एक दशक में हजारों कंपनियाँ दिवाला प्रक्रिया से गुजरीं। लाखों करोड़ रुपये के मामलों का निपटारा हुआ। उद्योग संगठनों और विशेषज्ञों ने बार-बार छोटे परिचालन ऋणदाताओं की समस्याएँ उठाईं। फिर भी एमएसएमई मंत्रालय की ओर से कोई बड़ा विधायी सुधार सामने नहीं आया। यह निष्क्रियता केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं बल्कि नीति निर्माण की असफलता भी मानी जाएगी।
सर्वोच्च अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट कहा कि छोटे उद्योग मामूली आर्थिक झटका भी सहन करने की स्थिति में नहीं होते। यदि किसी बड़े कॉरपोरेट पर उनकी लाखों या करोड़ों रुपये की देनदारी फँस जाए और बाद में वही कंपनी आईबीसी प्रक्रिया में चली जाए, तो सबसे पहले नुकसान एमएसएमई को होता है। कई छोटे उद्योग ऐसे झटके के बाद हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं।
मोदी सरकार के एमएसएमई विजन पर असर
प्रधानमंत्री मोदी हर मंच से एमएसएमई को रोजगार सृजन का सबसे बड़ा माध्यम बताते हैं, जबकि मंत्रालय उस कानूनी सुरक्षा को मजबूत करने में विफल दिखाई देता है जिसकी सबसे अधिक आवश्यकता है। योजनाओं की संख्या बढ़ाने से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि छोटे उद्योगों की कमाई सुरक्षित रहे। यदि भुगतान ही नहीं मिलेगा, तो कोई भी योजना उन्हें बचा नहीं सकती।
मंत्रालय अक्सर उपलब्धियों की लंबी सूची जारी करता है—पंजीकरण, ऋण वितरण, डिजिटल पोर्टल, प्रशिक्षण कार्यक्रम और विभिन्न योजनाओं के आँकड़े। लेकिन सर्वोच्च अदालत की टिप्पणी बताती है कि मूल समस्या कहीं अधिक गहरी है। यदि कानून ही छोटे उद्योगों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं देता, तो प्रशासनिक उपलब्धियों के दावे अधूरे साबित होते हैं।
छोटे उद्योगों को न्याय कब मिलेगा?
देश के करोड़ों छोटे उद्यमी किसी विशेष अनुग्रह की मांग नहीं कर रहे। वे केवल इतना चाहते हैं कि उनके वैध बकाये की सुरक्षा हो, कानून उनके साथ न्याय करे और दिवाला प्रक्रिया में उन्हें पूरी तरह उपेक्षित न कर दिया जाए। यह किसी भी संवेदनशील सरकार की न्यूनतम जिम्मेदारी होनी चाहिए।
अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या केंद्रीय एमएसएमई मंत्रालय सर्वोच्च अदालत की इस टिप्पणी को गंभीरता से लेगा? क्या मंत्रालय विधि मंत्रालय और वित्त मंत्रालय के साथ मिलकर आईबीसी में संशोधन का प्रारूप तैयार करेगा? या फिर यह महत्वपूर्ण न्यायिक टिप्पणी भी अन्य फाइलों की तरह मंत्रालय के किसी अलमारी में धूल खाती रह जाएगी?
निष्कर्ष
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यदि वास्तव में एमएसएमई को विकसित भारत का आधार मानते हैं, तो अब समय केवल भाषणों का नहीं बल्कि कठोर प्रशासनिक जवाबदेही का है। मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों से पूछा जाना चाहिए कि इतने वर्षों तक उन्होंने इस गंभीर खामी को दूर करने के लिए क्या किया। यदि इसका संतोषजनक उत्तर नहीं है, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि प्रधानमंत्री के एमएसएमई सशक्तिकरण के सपने को सबसे बड़ा झटका विपक्ष ने नहीं, बल्कि मंत्रालय की उदासीनता और सुस्त कार्यप्रणाली ने दिया है।
देश की सर्वोच्च अदालत ने अपना संवैधानिक दायित्व निभाते हुए समस्या की पहचान भी कर दी और समाधान का रास्ता भी सुझा दिया। अब बारी केंद्र सरकार, एमएसएमई मंत्रालय और उसके शीर्ष अधिकारियों की है। यदि अब भी सुधार नहीं हुआ, तो इसकी कीमत देश के करोड़ों छोटे उद्यमियों, लाखों उद्योगों और करोड़ों रोजगारों को चुकानी पड़ेगी।