शाह का ऐलान, पूर्वोत्तर में है ईंधन-तेल का समाधान

admin
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  • अफसरशाही के शिकंजे में फंसा पूर्वोत्तर, शाह ने दिखाया रास्ता, मंत्रालय ढूंढता रहा बहाने
  • निजी क्षेत्र को और अधिक देनी होगी सुविधा, अनुसंधान एवं विकास को मिले बढ़ावा
  • प्रधान के बाद हरदीप पुरी ने किया मंत्रालय का बेड़ा गर्क

रितेश सिन्हा दिल्ली। “पूर्वोत्तर विशाल कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और अन्य खनिज संपदाओं का भंडार है, जो अब तक पूरी तरह उपयोग में नहीं लाए जा सके हैं। छोटी-छोटी समस्याओं के कारण हम इस राष्ट्रीय संपदा का लाभ नहीं उठा पाए। वर्तमान में हमारी उत्पादन क्षमता 1000 से 1500 बैरल प्रतिदिन है, जो इस समझौते के बाद बढ़कर 10 हजार बैरल प्रतिदिन हो जाएगी।”

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का यह वक्तव्य केवल एक सरकारी घोषणा नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा नीति की वर्षों पुरानी विफलताओं पर एक टिप्पणी भी है। जिस पूर्वोत्तर क्षेत्र को देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता का आधार बनना चाहिए था, वह मंत्रालयी उदासीनता, अफसरशाही के जाल, सीमा विवादों और निर्णयहीनता के कारण दशकों तक अपनी क्षमता से बहुत नीचे काम करता रहा। आज शाह के हस्तक्षेप के बाद जब नई संभावनाएं सामने आ रही हैं, तब यह सवाल भी उतनी ही मजबूती से उठ रहा है कि आखिर इतने वर्षों तक पेट्रोलियम मंत्रालय क्या करता रहा?

भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है। वित्त वर्ष 2024-25 में देश ने लगभग 23.4 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात किया। देश अपनी कुल जरूरत का करीब 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। इस आयात पर सालाना 200 अरब डॉलर से अधिक, यानी लगभग 17 से 18 लाख करोड़ रुपये तक खर्च हो जाते हैं। यह राशि भारत के रक्षा बजट से भी कई गुना अधिक है। दूसरी ओर देश के भीतर मौजूद संसाधनों का पर्याप्त उपयोग नहीं हो पाया।

पूर्वोत्तर में ऊर्जा संपदा का विशाल भंडार

पूर्वोत्तर भारत के ऊर्जा मानचित्र का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है। असम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा में तेल और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार मौजूद हैं। डिगबोई, नाहरकटिया, मोरान, रुद्रसागर और लाकवा जैसे क्षेत्र दशकों से देश को ऊर्जा उपलब्ध करा रहे हैं। डिगबोई को तो एशिया के सबसे पुराने तेल क्षेत्रों में गिना जाता है। इसके बावजूद आज भी पूर्वोत्तर की विशाल क्षमता का बड़ा हिस्सा जमीन के नीचे पड़ा हुआ है।

घटता घरेलू उत्पादन, बढ़ती आयात निर्भरता

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2011-12 में भारत का घरेलू कच्चा तेल उत्पादन लगभग 38 मिलियन टन था, जो 2024-25 तक घटकर करीब 29 मिलियन टन रह गया। यानी एक दशक में लगभग 24 प्रतिशत गिरावट। दूसरी तरफ पेट्रोलियम उत्पादों की मांग 158 मिलियन टन से बढ़कर लगभग 240 मिलियन टन तक पहुंच गई। मांग बढ़ती गई, आयात बढ़ता गया, लेकिन उत्पादन घटता गया। यह केवल बाजार की समस्या नहीं बल्कि नीति निर्माण की विफलता का भी प्रमाण है।

अफसरशाही और सीमा विवादों में फंसी परियोजनाएं

सबसे चिंताजनक बात यह है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े इस प्रश्न पर मंत्रालय लंबे समय तक केवल योजनाएं बनाता रहा। पूर्वोत्तर में भूमि अधिग्रहण, वन स्वीकृतियां, पर्यावरणीय मंजूरियां और सीमा विवाद वर्षों तक परियोजनाओं को रोकते रहे। असम और नागालैंड के बीच लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद के कारण अनेक संभावित तेल क्षेत्रों में खोज और उत्पादन गतिविधियां प्रभावित हुईं। ऑयल इंडिया लिमिटेड और ओएनजीसी जैसी कंपनियां लगातार इन समस्याओं की ओर संकेत करती रहीं, लेकिन समाधान नहीं निकला।

अमित शाह की पहल से खुला समाधान का रास्ता

अब अमित शाह की पहल पर असम, नागालैंड और केंद्र सरकार के बीच जो सहमति बनी है, उसने यह साबित कर दिया है कि समस्या संसाधनों की नहीं थी, समस्या इच्छाशक्ति की थी। यदि उत्पादन क्षमता 1000-1500 बैरल प्रतिदिन से बढ़कर 10 हजार बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकती है, तो इसका अर्थ है कि वर्षों तक देश की ऊर्जा संपदा प्रशासनिक जड़ता की भेंट चढ़ती रही।

धर्मेंद्र प्रधान के दौर की घोषणाएं और हकीकत

दिलचस्प यह है कि पूर्वोत्तर में तेल और गैस संसाधनों के दोहन की सुस्ती केवल हरदीप सिंह पुरी के कार्यकाल तक सीमित नहीं रही। धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में पूर्वोत्तर को ऊर्जा हब बनाने के बड़े-बड़े दावे हुए। इंद्रधनुष गैस ग्रिड, हाइड्रोकार्बन विजन-2030, पाइपलाइन विस्तार और निवेश सम्मेलनों की घोषणाएं भी हुईं। लेकिन जमीनी स्तर पर परिणाम सीमित रहे। यदि पूर्वोत्तर वास्तव में मंत्रालय की सर्वोच्च प्राथमिकता होता तो घरेलू उत्पादन में गिरावट के बजाय वृद्धि दिखाई देती। घोषणाओं और वास्तविक उपलब्धियों के बीच का अंतर लगातार बढ़ता गया।

हरदीप पुरी के कार्यकाल पर उठते सवाल

हरदीप सिंह पुरी के कार्यकाल में मंत्रालय की प्राथमिकताएं और भी अलग दिशा में चली गईं। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत द्वारा सस्ता रूसी तेल खरीदना निश्चित रूप से आर्थिक दृष्टि से लाभकारी कदम था। लेकिन यह ऊर्जा आत्मनिर्भरता का विकल्प नहीं हो सकता। 2021 में भारत रूस से प्रतिदिन लगभग 40 हजार बैरल तेल खरीदता था। 2025 तक यह आंकड़ा 15 से 20 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया। इसका अर्थ यह हुआ कि आयात का स्रोत बदला, लेकिन आयात पर निर्भरता नहीं घटी।

यदि किसी पेट्रोलियम मंत्री की सफलता का पैमाना भारत की आयात निर्भरता कम करना है, तो तस्वीर उत्साहजनक नहीं दिखती। आज भी देश अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीद रहा है। यानी मंत्री बदलते रहे, नीतियों के नाम बदलते रहे, लेकिन मूल समस्या जस की तस बनी रही।

तेल आयात बिल बना बड़ी आर्थिक चुनौती

वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का तेल आयात बिल लगभग 220 अरब डॉलर के आसपास पहुंच गया। भारतीय मुद्रा में यह लगभग 18 लाख करोड़ रुपये बैठता है। तुलना करें तो यह राशि देश के रक्षा बजट के लगभग तीन गुना के बराबर है। कृषि, सड़क परिवहन और कई अन्य मंत्रालयों के संयुक्त व्यय से भी अधिक है। इसके बावजूद घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए वैसी राष्ट्रीय प्रतिबद्धता दिखाई नहीं दी जैसी दिखाई जानी चाहिए थी।

क्या घरेलू उत्पादन राष्ट्रीय प्राथमिकता बना?

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय का वार्षिक बजट लगभग 19 हजार करोड़ रुपये है। लेकिन समस्या केवल धन की नहीं है। समस्या प्राथमिकताओं की है। जब कोई देश अपनी जरूरत का 88 प्रतिशत तेल आयात करता हो, तब घरेलू उत्पादन को राष्ट्रीय मिशन बनाया जाना चाहिए। दुर्भाग्य से पिछले वर्षों में मंत्रालय की प्राथमिकताओं में यह विषय पीछे छूटता दिखाई दिया।

निजी क्षेत्र की भागीदारी क्यों जरूरी है

ऊर्जा विशेषज्ञ लंबे समय से कह रहे हैं कि भारत को निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ानी होगी। अमेरिका और कनाडा जैसे देशों ने निजी निवेश, तकनीकी नवाचार और प्रतिस्पर्धी माहौल के माध्यम से ऊर्जा उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि की है। भारत में आज भी लाइसेंसिंग प्रक्रिया जटिल है, पर्यावरणीय मंजूरियां लंबी हैं, भूमि अधिग्रहण कठिन है और राज्यों तथा केंद्र के बीच समन्वय की कमी बनी रहती है। परिणामस्वरूप अनेक संभावित निवेश परियोजनाएं वर्षों तक अटक जाती हैं।

पूर्वोत्तर में ऊर्जा क्रांति

पूर्वोत्तर में तेल और गैस उत्पादन का रास्ता केवल सरकारी कंपनियों के भरोसे नहीं खुलने वाला। निजी क्षेत्र को अधिक अवसर देने होंगे। खोज एवं उत्पादन गतिविधियों में प्रतिस्पर्धा बढ़ानी होगी। निवेशकों को नीति स्थिरता और त्वरित निर्णय का भरोसा देना होगा। अन्यथा देश की विशाल ऊर्जा संपदा का दोहन अपेक्षित गति से नहीं हो पाएगा।

अनुसंधान एवं विकास से मिलेगी नई रफ्तार

इसके साथ ही अनुसंधान एवं विकास पर भी विशेष ध्यान देना होगा। पूर्वोत्तर का भूगर्भीय ढांचा चुनौतीपूर्ण है। आधुनिक ड्रिलिंग तकनीक, त्रिआयामी भूकंपीय सर्वेक्षण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विश्लेषण और उन्नत रिकवरी तकनीकों के बिना बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव नहीं है। दुनिया की अग्रणी ऊर्जा कंपनियां अपने राजस्व का महत्वपूर्ण हिस्सा अनुसंधान एवं विकास पर खर्च करती हैं, जबकि भारत में यह क्षेत्र अभी भी अपेक्षित निवेश का इंतजार कर रहा है।

ऊर्जा विकास से बदलेगा पूर्वोत्तर का भविष्य

पूर्वोत्तर केवल ऊर्जा संसाधनों का क्षेत्र नहीं है, बल्कि स्थानीय विकास का भी अवसर है। यदि तेल और गैस परियोजनाओं को गति मिलती है, तो हजारों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित हो सकते हैं। सड़क, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं का विस्तार हो सकता है। स्थानीय समुदायों को विकास का प्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है। यही कारण है कि ऊर्जा विकास और क्षेत्रीय विकास को साथ-साथ देखने की आवश्यकता है।

राजनीतिक इच्छाशक्ति बनाम प्रशासनिक जड़ता

अमित शाह के हालिया हस्तक्षेप ने एक असहज लेकिन महत्वपूर्ण सच्चाई को उजागर कर दिया है। पूर्वोत्तर में तेल और गैस उत्पादन की राह में सबसे बड़ी बाधा संसाधनों की कमी नहीं थी, बल्कि निर्णय लेने की कमी थी। जिस क्षेत्र को दशकों तक विवाद, अनुमतियों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का हवाला देकर रोका गया, वहां आज राजनीतिक इच्छाशक्ति के बल पर समाधान का रास्ता निकलता दिखाई दे रहा है।

यह केवल हरदीप सिंह पुरी के कार्यकाल पर प्रश्नचिह्न नहीं है। यह उन सभी वर्षों की समीक्षा का अवसर है जब पेट्रोलियम मंत्रालय ने पूर्वोत्तर को ऊर्जा क्रांति का केंद्र बनाने के दावे तो किए, लेकिन परिणाम अपेक्षित स्तर पर नहीं दे पाया। धर्मेंद्र प्रधान के समय योजनाएं बनीं, हरदीप पुरी के समय वैश्विक तेल खरीद की नई कहानियां लिखी गईं, लेकिन भारत की आयात निर्भरता 85 से 88 प्रतिशत के बीच बनी रही। घरेलू उत्पादन लगातार घटता गया और पूर्वोत्तर की विशाल ऊर्जा संपदा फाइलों और विवादों के बीच फंसी रही।

ऊर्जा आत्मनिर्भरता की अग्निपरीक्षा

मोदी सरकार आत्मनिर्भर भारत की बात करती है। अमित शाह ने पूर्वोत्तर में तेल और गैस उत्पादन की दिशा भी दिखा दी है। अब सबसे बड़ी परीक्षा पेट्रोलियम मंत्रालय की है। यदि मंत्रालय इस अवसर को भी खो देता है, तो आने वाले वर्षों में देश के सामने यह प्रश्न बार-बार उठेगा कि जब तेल और गैस के भंडार देश के भीतर मौजूद थे, तब भारत को विदेशी तेल पर इतना निर्भर रहने के लिए आखिर किसने मजबूर किया?

अब बहानों की नहीं, परिणामों की जरूरत

पूर्वोत्तर केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और रणनीतिक स्वतंत्रता का आधार बन सकता है। लेकिन इसके लिए मंत्रालय को घोषणाओं और प्रस्तुतियों से आगे बढ़कर परिणाम देने होंगे। क्योंकि अब जब शाह रास्ता दिखा चुके हैं, तब बहानों की गुंजाइश बहुत कम बची है।

 

डिस्क्लेमर:
यह लेख रितेश सिन्हा के व्यक्तिगत विचार, विश्लेषण और समसामयिक आर्थिक परिस्थितियों की उनकी समझ पर आधारित है। लेख में व्यक्त मत आवश्यक नहीं कि किसी समाचार संस्था, संगठन या प्रकाशक के आधिकारिक विचार हों। इसमें उल्लिखित तथ्य, टिप्पणियां और विश्लेषण सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध सूचनाओं, सरकारी बयानों तथा मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं। लेख का उद्देश्य केवल जनचर्चा और विषय पर विमर्श को बढ़ावा देना है।

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