बिहार कांग्रेस में ‘पोस्ट की बोली’ का आरोप: नेतृत्व की नाकामी से संगठन ध्वस्त

संगठन नहीं, सिस्टम ही सवालों के घेरे में

admin
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Highlights
  • Bihar Congress में “Post ki boli” का serious allegation
  • “Sangathan Srijan Abhiyan” पर credibility crisis
  • Rahul Gandhi तक पहुंची internal complaint
  • सुधार नहीं हुआ तो “सृजन” बन सकता है “विनाश”
  • पार्टी के भीतर से ही उठ रही बगावत की आवाज

बदहाली की ओर बिहार कांग्रेस: अनुभवहीन नेतृत्व और मनमानी का खेल बेनकाब

रितेश सिन्हा  दिल्ली । बिहार कांग्रेस आज केवल कमजोर नहीं, बल्कि भरोसे के गहरे संकट से गुजर रही है। कभी गांव-गांव में अपनी पकड़ रखने वाली Indian National Congress अब अपने ही कार्यकर्ताओं के बीच सवालों के घेरे में है। हालात ऐसे बन चुके हैं कि पार्टी के भीतर ही आवाज उठ रही है—“आखिर संगठन चल कैसे रहा है?” यह संकट केवल चुनावी हार का नहीं, बल्कि संगठन के भीतर लगातार हो रही टूट का संकेत है।

इस असंतोष को और स्पष्ट करता है वह पत्र, जो Rahul Gandhi को भेजा गया। “संगठन सृजन अभियान” के नाम पर शुरू हुई प्रक्रिया अब खुद संदेह के घेरे में है। आरोप है कि All India Congress Committee के पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट को दरकिनार कर फैसले लिए जा रहे हैं। यदि यह सच है, तो फिर यह अभियान लोकतांत्रिक कम और औपचारिक अधिक नजर आता है—ऊपर से पारदर्शिता, भीतर से बंद कमरों की राजनीति।

“कौन किसके करीब ”

प्रदेश नेतृत्व की भूमिका यहां सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में है। उम्मीद रहती है कि नेतृत्व सभी वर्गों को साथ लेकर चलेगा, लेकिन जब फैसले योग्यता की बजाय “कौन किसके करीब है” के आधार पर होने लगें, तो संगठन का कमजोर होना तय है। यह असंतोष नया नहीं है। टिकट बंटवारे के समय भी इसी तरह की शिकायतें सामने आई थीं, जिन्हें उस समय सामान्य असंतोष कहकर टाल दिया गया। लेकिन आज वही असंतोष एक बड़े संकट का रूप ले चुका है।

जिला अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों पर ऐसे लोगों की नियुक्ति, जिनका अपने क्षेत्र से जुड़ाव ही कमजोर हो, कार्यकर्ताओं के मनोबल को तोड़ने का काम करती है। जो लोग वर्षों से पार्टी के लिए मेहनत कर रहे हैं, वे खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे हैं, जबकि प्रभावशाली लोग आगे बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में जमीनी कार्यकर्ता अपनी बात किससे कहे—यह सबसे बड़ा सवाल बन गया है।

इसी माहौल में “सृजन साथी” अभियान की शुरुआत हुई है। 50 रुपये की सदस्यता और पांच साल की वैधता—सुनने में यह एक साधारण सदस्यता अभियान लगता है। लेकिन बिहार की राजनीतिक जमीन पर इसे लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। लोगों के बीच चर्चा है कि यह केवल जनसंपर्क का माध्यम है या फिर संसाधन जुटाने का नया तरीका?

छोटी राशि होने के बावजूद, जब यह संख्या लाखों में पहुंचेगी, तो कुल रकम बड़ी हो जाएगी। ऐसे में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। खासकर तब, जब पहले से ही संगठन के भीतर पारदर्शिता को लेकर भरोसा कमजोर हो चुका हो।

कांग्रेस के भीतर सदस्यता और फंडिंग

कांग्रेस के भीतर सदस्यता और फंडिंग को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऊपर स्तर पर क्या हो रहा है, इसकी स्पष्ट जानकारी नीचे तक नहीं पहुंचती। यही कारण है कि धीरे-धीरे भरोसा खत्म होता जा रहा है। महिला कांग्रेस में भी सदस्यता को लेकर विवाद सामने आ चुके हैं, जहां कई नेताओं ने दबाव और अस्पष्टता का आरोप लगाया था।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि समस्या नई नहीं है, बल्कि लंबे समय से चली आ रही है। बस हर बार यह नए रूप में सामने आती है। “सृजन साथी” अभियान ऐसे समय में आया है, जब संगठन पहले से ही कमजोर स्थिति में है। ऐसे में यह अभियान अवसर से ज्यादा नेतृत्व की परीक्षा बन गया है।

पार्टी के भीतर से उठ रही आवाजें इस संकट को और गंभीर बनाती हैं। कई वरिष्ठ और जमीनी नेताओं ने खुलकर असंतोष जताया है। उनका कहना है कि संगठन के मूल सिद्धांतों से समझौता किया जा रहा है और समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी हो रही है। कुछ नेताओं ने इसे संगठन के साथ अन्याय बताया, तो कुछ ने पारदर्शिता की कमी को सबसे बड़ा खतरा बताया।

“नाराजगी” कहकर नजरअंदाज

इन आवाजों को अब केवल “नाराजगी” कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह वही लोग हैं, जिन्होंने वर्षों तक पार्टी को जमीन पर मजबूत बनाए रखा। जब वही लोग सवाल उठाने लगें, तो यह संकेत है कि समस्या गहरी है।

सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि क्या यह समस्या केवल बिहार तक सीमित है, या फिर संगठन के बड़े ढांचे में भी यही स्थिति है? जब फैसले कुछ लोगों तक सिमट जाएं, जब जमीनी स्तर की आवाज ऊपर तक न पहुंचे और जब जवाबदेही खत्म हो जाए—तो संगठन केवल कागजों में रह जाता है, जमीन पर नहीं।

आज बिहार कांग्रेस एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। एक रास्ता है—अपनी गलतियों को स्वीकार कर सुधार की दिशा में कदम बढ़ाना। दूसरा रास्ता है—स्थिति को नजरअंदाज कर उसे और बिगड़ने देना।

“पोस्ट की बोली”

“पोस्ट की बोली” के आरोप, नियुक्तियों पर सवाल और “50 रुपये वाला फॉर्मूला”—ये सभी संकेत एक ही दिशा में इशारा करते हैं कि समस्या केवल एक-दो फैसलों की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की है।

अगर समय रहते सुधार नहीं हुआ, तो “सृजन” का यह नारा कहीं “विनाश” की कहानी न बन जाए। और तब यह 50 रुपये की सदस्यता केवल एक फीस नहीं रहेगी—बल्कि लोगों को यह एहसास दिलाएगी कि उनसे पैसा नहीं, उनका भरोसा लिया गया था… और वही सबसे पहले खत्म हो गया।

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