सरकार की सियासी ढाल बने धर्मेंद्र प्रधान: मोदी को करनी होगी व्यवस्था की सर्जरी, किचन कैबिनेट पर भी मंथन जरूरी

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सरकार की सियासी ढाल बने धर्मेंद्र प्रधान

मोदी को करनी होगी व्यवस्था की सर्जरी, किचन कैबिनेट पर भी मंथन जरूरी

रितेश सिन्हा

नीट परीक्षा विवाद ने केवल देश की सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षा की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया, बल्कि शासन, जवाबदेही और राजनीतिक नेतृत्व की कार्यशैली पर भी गंभीर बहस छेड़ दी। छात्र सड़कों पर थे, संसद में गतिरोध था और पूरा देश जवाब चाहता था। ऐसे समय में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा केवल एक मंत्री का पद छोड़ना नहीं था, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी था। इस कदम ने तत्काल सरकार पर बढ़ते दबाव को कम किया और राजनीतिक बहस का केंद्र व्यवस्था की विफलता से हटकर एक व्यक्ति के इस्तीफे पर आ गया। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नैतिक जिम्मेदारी था या राजनीतिक रणनीति, इस पर मतभेद हो सकते हैं। यदि यह कदम नहीं उठाया जाता, तो संसद से लेकर सड़कों तक हर राजनीतिक हमला सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार पर केंद्रित होता। इस्तीफे ने सरकार को तत्काल राहत दी और विपक्ष के सबसे बड़े राजनीतिक अभियान की धार भी काफी हद तक कुंद कर दी।

क्या केवल एक मंत्री का इस्तीफा पर्याप्त जवाब है?

सरकार यह संदेश देने में सफल रही कि जवाबदेही तय की जा रही है। लेकिन साथ ही यह प्रश्न भी बना रहा कि क्या केवल एक मंत्री का इस्तीफा उस पूरी व्यवस्था की विफलता का पर्याप्त उत्तर है, जिसने देश के लाखों छात्रों का भरोसा डगमगा दिया। इसी बीच दिल्ली पुलिस ने सार्वजनिक रूप से फेक न्यूज, पाकिस्तानी सोशल मीडिया हैंडल्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित डीपफेक अभियानों के दुरुपयोग का उल्लेख किया। यदि यह खतरा वास्तव में इतना गंभीर था, तो बहस केवल नीट तक सीमित नहीं रह जाती। तब प्रश्न पूरे राष्ट्रीय सूचना एवं सुरक्षा तंत्र की कार्यक्षमता पर भी उठता है।

सूचना तंत्र, साइबर सुरक्षा और सरकारी एजेंसियों की जवाबदेही

यदि सरकारी एजेंसियों के पास ऐसी गतिविधियों की जानकारी थी, तो उन्हें समय रहते निष्प्रभावी करने के लिए क्या कदम उठाए गए? यदि जानकारी नहीं थी तो यह और भी गंभीर विषय है। देशभर में तेजी से उभरते छात्र आंदोलनों, सोशल मीडिया पर फैलते भ्रम और डिजिटल दुष्प्रचार के दौर में केवल शिक्षा मंत्रालय को कटघरे में खड़ा कर देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, गृह मंत्रालय, सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े विभाग, साइबर सुरक्षा एजेंसियां और सरकारी संचार तंत्र सभी की भूमिका की निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक है।

मंत्रालयों के बीच समन्वय पर सबसे बड़ा प्रश्न

यदि लाखों युवाओं तक भ्रामक सूचनाएँ, डीपफेक सामग्री और संगठित डिजिटल दुष्प्रचार पहुँचता रहा तो यह केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सूचना-सुरक्षा का विषय भी है। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, लेकिन यदि सरकारी एजेंसियां स्वयं विदेशी हस्तक्षेप या संगठित दुष्प्रचार की आशंका व्यक्त करती हैं, तो उन एजेंसियों की जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है। सबसे बड़ा प्रश्न है कि क्या सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, गृह मंत्रालय, सूचना प्रौद्योगिकी तंत्र, साइबर सुरक्षा एजेंसियों और संचार व्यवस्था के बीच पर्याप्त समन्वय था? यदि नहीं, तो उसकी जिम्मेदारी कौन स्वीकार करेगा? किसी एक मंत्री का इस्तीफा पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकता।

नेतृत्व की परीक्षा केवल विजन से नहीं, क्रियान्वयन से होती है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक क्षमता, निर्णय लेने की शक्ति और दीर्घकालिक सोच को लेकर अलग-अलग मत हो सकते हैं, लेकिन किसी भी नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा उसकी टीम से होती है। नेतृत्व विज़न देता है, लेकिन उसे जमीन पर उतारने का काम मंत्री, अधिकारी और संस्थागत तंत्र करते हैं। बीते कुछ वर्षों में बार-बार ऐसे अवसर आए हैं जब नीतियों की घोषणा प्रभावशाली रही, लेकिन उनका क्रियान्वयन अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पाया। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि समस्या केवल नीति में नहीं, बल्कि उसके निष्पादन में भी है।

किचन कैबिनेट और फीडबैक सिस्टम की समीक्षा की जरूरत

यदि प्रधानमंत्री का विज़न व्यापक है तो उसे लागू करने वाली टीम भी उतनी ही सक्षम, जवाबदेह और परिणामोन्मुखी होनी चाहिए। अन्यथा सबसे मजबूत नेतृत्व भी कमजोर प्रशासनिक ढांचे के कारण आलोचना का सामना करता है। हर सरकार के पास एक अनौपचारिक सलाहकार समूह होता है। जब वही समूह वास्तविक फीडबैक की जगह केवल सुखद सूचनाएँ देने लगे, जब आलोचना को असहज मान लिया जाए और आत्मसंतुष्टि निर्णयों पर हावी हो जाए, तब शासन की गुणवत्ता प्रभावित होना स्वाभाविक है।

सरकार और विपक्ष दोनों की जवाबदेही जरूरी

सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी विपक्ष नहीं होता; कई बार वह व्यवस्था होती है जो शीर्ष नेतृत्व तक वास्तविक स्थिति पहुँचने ही नहीं देती। यदि ऐसा है, तो समय रहते उस संस्कृति की समीक्षा भी आवश्यक है। यदि सरकार इस पूरे प्रकरण में सवालों के घेरे में है तो विपक्ष भी अपने दायित्व से मुक्त नहीं है। उसने छात्रों की पीड़ा को व्यापक शिक्षा सुधार के एजेंडे में बदलने के बजाय उसे मुख्यतः राजनीतिक नारों और सरकार विरोधी अभियान तक सीमित रखा।

विपक्ष के सामने वैकल्पिक मॉडल पेश करने की चुनौती

देश यह जानना चाहता था कि विपक्ष परीक्षा प्रणाली में सुधार कैसे करेगा, पेपर लीक रोकने के लिए उसका मॉडल क्या है, भर्ती परीक्षाओं को पारदर्शी बनाने की उसकी योजना क्या है और डिजिटल दुष्प्रचार से निपटने की उसकी रणनीति क्या होगी। लेकिन इन प्रश्नों पर ठोस वैकल्पिक दृष्टि सामने नहीं आई। केवल नारे, धरने और संसद में हंगामा किसी लोकतांत्रिक विकल्प का प्रमाण नहीं होते। एक जिम्मेदार विपक्ष का दायित्व केवल सत्ता की आलोचना करना नहीं, बल्कि बेहतर व्यवस्था का खाका प्रस्तुत करना भी है। दुर्भाग्य से इस पूरे विवाद में विपक्ष यह अवसर भी पूरी तरह भुना नहीं सका।

अब व्यापक प्रशासनिक सुधार की आवश्यकता

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा तत्काल राजनीतिक संकट को कम करने में उपयोगी हो सकता है, लेकिन यदि इससे यह संदेश जाए कि जवाबदेही केवल एक व्यक्ति तक सीमित है, तो यह अधूरा समाधान होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अब केवल एक मंत्रालय नहीं, बल्कि पूरी शासन व्यवस्था की व्यापक समीक्षा करनी चाहिए। सूचना तंत्र, गृह मंत्रालय, साइबर सुरक्षा, शिक्षा प्रणाली, सरकारी संचार और मंत्रालयों के बीच समन्वय—इन सभी की स्वतंत्र समीक्षा समय की आवश्यकता है।

निष्कर्ष: संकट प्रबंधन नहीं, संस्थागत सुधार का समय

यदि सरकार वास्तव में मानती है कि विदेशी दुष्प्रचार, डीपफेक और डिजिटल भ्रम अभियान लोकतांत्रिक संस्थाओं को प्रभावित कर रहे हैं, तो फिर इन चुनौतियों से निपटने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित रणनीति भी उतनी ही आवश्यक है। जवाबदेही केवल राजनीतिक नहीं, प्रशासनिक भी तय होनी चाहिए। नीट विवाद ने केवल एक परीक्षा व्यवस्था की कमियों को उजागर नहीं किया, बल्कि शासन, सूचना प्रबंधन और संस्थागत समन्वय की भी परीक्षा ली है। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा तत्काल राजनीतिक दबाव कम करने का माध्यम बन सकता है, लेकिन यदि इसके बाद भी व्यवस्था नहीं बदली, तो यह केवल संकट प्रबंधन बनकर रह जाएगा।

उसी तरह विपक्ष को भी यह समझना होगा कि केवल सरकार विरोधी नारों से युवाओं का भविष्य सुरक्षित नहीं होगा। उसे भी वैकल्पिक नीतियाँ, ठोस सुधार और विश्वसनीय रोडमैप देना होगा। अब समय किसी एक मंत्री, किसी एक दल या किसी एक राजनीतिक चेहरे पर बहस का नहीं है। समय उस पूरी व्यवस्था का पुनर्मूल्यांकन करने का है, जिस पर देश के करोड़ों युवाओं का भविष्य टिका हुआ है। यदि इस संकट से सीख लेकर व्यापक संस्थागत सुधार किए जाते हैं, तभी यह इस्तीफा इतिहास में एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि सुधार की शुरुआत के रूप में याद किया जाएगा।

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