बिहार में इंफ्रास्ट्रक्चर बूम के बावजूद रोजगार संकट, सम्राट चौधरी के सामने उद्योगीकरण की बड़ी चुनौती

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बिहार के रोडमैप में आधारभूत संरचना पर जोर, पिछलग्गू राज्य के तमगे से पीछा छुड़ाने में जुटे सम्राट

हजारों करोड़ के निवेश के बावजूद रोजगार और उद्योग पर सवाल बरकरार, बियाडा और नौकरशाही की भूमिका भी कटघरे में

रितेश सिन्हा दिल्ली ।  बिहार एक बार फिर विकास की नई बहस के केंद्र में है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि प्रस्तावित औद्योगिक क्षेत्रों, सैटेलाइट टाउनशिप और शहरी विस्तार परियोजनाओं के लिए समेकित आधारभूत संरचना विकसित करने की कार्ययोजना पर तेजी से काम किया जाए। भूमि की पहचान, अधिग्रहण और हस्तांतरण की प्रक्रिया को गति देने के साथ-साथ सभी परियोजनाओं की नियमित समीक्षा करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

सरकार का दावा है कि बिहार अब केवल सड़क और पुल निर्माण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि निवेश, उद्योग और रोजगार आधारित अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ेगा। यह लक्ष्य महत्वाकांक्षी है, लेकिन इसकी सफलता केवल घोषणाओं से नहीं बल्कि धरातल पर दिखने वाले परिणामों से तय होगी।

सड़कों से आगे बढ़कर उद्योगों की चुनौती

पिछले दो दशकों में बिहार ने आधारभूत संरचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। वर्ष 2005 में जहां राज्य की सड़क लंबाई लगभग 14 हजार किलोमीटर थी, वहीं आज यह 26 हजार किलोमीटर से अधिक हो चुकी है। राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार हुआ, गंगा पर नए पुल बने, ग्रामीण संपर्क मार्ग मजबूत हुए और बिजली आपूर्ति की स्थिति में भी बड़ा सुधार आया।

केवल वर्ष 2025 में राज्य सरकार ने 21,406 करोड़ रुपये की लागत वाली 11,346 सड़कों और 730 पुलों से जुड़ी परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया। इसके अतिरिक्त 8,716 करोड़ रुपये की लागत से 6,938 ग्रामीण सड़कों के सुदृढ़ीकरण का कार्य शुरू किया गया।

आज बिहार का बजट 3.47 लाख करोड़ रुपये से अधिक का हो चुका है। राज्य की अर्थव्यवस्था का आकार लगभग 13 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। वित्त वर्ष 2026-27 में पूंजीगत व्यय 63 हजार करोड़ रुपये से अधिक रखा गया है। यह स्पष्ट संकेत है कि राज्य सरकार आधारभूत ढांचे के निर्माण पर अभूतपूर्व निवेश कर रही है।

लेकिन इन आंकड़ों के समानांतर एक असहज सवाल भी मौजूद है—क्या इस निवेश का लाभ आम नागरिक की आय और रोजगार में दिखाई दे रहा है?

विकास मॉडल पर उठते सवाल

बिहार आज भी प्रति व्यक्ति आय के मामले में देश के सबसे पिछड़े राज्यों में शामिल है। भारी सरकारी निवेश के बावजूद उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था का निर्माण अपेक्षित गति से नहीं हो पाया है। लाखों बिहारी आज भी रोजगार की तलाश में दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की ओर पलायन कर रहे हैं।

यही वह बिंदु है जहां बिहार के विकास मॉडल पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। यदि सड़कें, पुल, बिजली और अन्य आधारभूत सुविधाएं बेहतर हुई हैं तो फिर राज्य में बड़े पैमाने पर औद्योगिक निवेश क्यों नहीं आया? आखिर बिहार अब भी देश का सबसे बड़ा श्रम आपूर्तिकर्ता राज्य क्यों बना हुआ है?

बियाडा की भूमिका पर बहस

औद्योगिकीकरण की जिम्मेदारी मुख्य रूप से बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण (बियाडा) पर रही है। संस्था का उद्देश्य उद्योगों के लिए भूमि उपलब्ध कराना, औद्योगिक क्षेत्रों का विकास करना और निवेशकों को आवश्यक सुविधाएं प्रदान करना है।

हाल के महीनों में बियाडा ने कई इकाइयों को भूमि आवंटित कर निवेश और रोजगार सृजन के दावे किए हैं। मई 2026 में 19 इकाइयों को लगभग 20 एकड़ भूमि आवंटित कर 284 करोड़ रुपये निवेश और 1,200 रोजगार की संभावना जताई गई। जनवरी 2026 में 25 इकाइयों को 12.5 एकड़ भूमि आवंटित कर 168 करोड़ रुपये निवेश तथा लगभग 1,194 रोजगार का अनुमान व्यक्त किया गया। फरवरी 2026 में 14 इकाइयों को 10 एकड़ भूमि देकर 108 करोड़ रुपये निवेश और लगभग 1,300 रोजगार सृजन का दावा किया गया।

हालांकि 13 करोड़ से अधिक आबादी वाले राज्य के संदर्भ में ये आंकड़े अपेक्षाकृत छोटे दिखाई देते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भूमि आवंटन और निवेश प्रस्तावों को सफलता का पैमाना नहीं माना जा सकता। किसी भी औद्योगिक नीति की वास्तविक सफलता तब मानी जाती है जब कारखाने चालू हों, उत्पादन बढ़े, निर्यात हो और स्थानीय युवाओं को स्थायी रोजगार मिले।

सरकारी खर्च बनाम निजी निवेश

बिहार के विकास मॉडल की एक प्रमुख विशेषता यह रही है कि विकास का बड़ा हिस्सा सरकारी खर्च पर आधारित रहा। सड़कें, पुल, भवन और सार्वजनिक परियोजनाएं मुख्य रूप से सरकारी निवेश से संचालित हुईं। लेकिन निजी क्षेत्र की भागीदारी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सकी।

किसी भी मजबूत अर्थव्यवस्था की पहचान निजी निवेश, औद्योगिक उत्पादन और रोजगार सृजन से होती है। बिहार में यही कड़ी सबसे कमजोर दिखाई देती है।

नौकरशाही पर भी उठ रहे सवाल

राज्य का प्रशासनिक ढांचा भी चर्चा के केंद्र में है। वर्ष 2026-27 में बिहार सरकार लगभग 72,960 करोड़ रुपये वेतन, 35,170 करोड़ रुपये पेंशन और 25,364 करोड़ रुपये ब्याज भुगतान पर खर्च करने जा रही है। इन तीन मदों पर कुल व्यय 1.33 लाख करोड़ रुपये से अधिक बैठता है।

ऐसे में जनता यह सवाल पूछ रही है कि जब व्यवस्था को चलाने पर इतना बड़ा खर्च हो रहा है, तब उसके अनुरूप परिणाम क्यों दिखाई नहीं दे रहे?

निवेशकों की ओर से लंबे समय से यह शिकायत की जाती रही है कि उन्हें कई स्तरों की स्वीकृतियों, विभागीय समन्वय की कमी और निर्णय लेने में देरी का सामना करना पड़ता है। कई औद्योगिक क्षेत्रों में आधारभूत सुविधाओं की कमी की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।

सम्राट चौधरी के सामने बड़ी परीक्षा

हालांकि तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने आधारभूत संरचना को उद्योग, निवेश और सैटेलाइट टाउनशिप के साथ जोड़ने की जो नई रणनीति अपनाई है, उसे राज्य की आर्थिक दिशा बदलने का प्रयास माना जा रहा है।

गया इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग सिटी जैसी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने, नए औद्योगिक क्षेत्रों के विकास और निवेश आकर्षित करने की कोशिशें इसी सोच का हिस्सा हैं।

लेकिन अंतिम फैसला घोषणाओं से नहीं, बल्कि परिणामों से होगा। बिहार की जनता अब शिलान्यास नहीं, उत्पादन देखना चाहती है। वह भूमि आवंटन नहीं, रोजगार देखना चाहती है। वह निवेश प्रस्ताव नहीं, चालू कारखाने देखना चाहती है।

यदि सरकार बियाडा की कार्यप्रणाली में सुधार, नौकरशाही की जवाबदेही तय करने और औद्योगिक परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा कराने में सफल होती है, तो बिहार वास्तव में पिछलग्गू राज्य की छवि से बाहर निकल सकता है।

निर्णायक मोड़ पर बिहार

बिहार अब ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां सड़कों और पुलों से आगे बढ़कर उद्योगों, निवेश और रोजगार की लड़ाई लड़नी है। यदि यह लड़ाई जीती गई तो राज्य की आर्थिक पहचान बदल सकती है। लेकिन यदि यह अवसर भी हाथ से निकल गया तो हजारों करोड़ रुपये की आधारभूत संरचना केवल सरकारी आंकड़ों तक सीमित होकर रह जाएगी।

तब सबसे बड़ा सवाल यही होगा—क्या बिहार ने सड़कें तो बना लीं, लेकिन उन सड़कों पर चलने वाली अर्थव्यवस्था खड़ी करने में देर कर दी?

 

डिस्क्लेमर:
यह लेख रितेश सिन्हा के व्यक्तिगत विचार, विश्लेषण और समसामयिक आर्थिक परिस्थितियों की उनकी समझ पर आधारित है। लेख में व्यक्त मत आवश्यक नहीं कि किसी समाचार संस्था, संगठन या प्रकाशक के आधिकारिक विचार हों। इसमें उल्लिखित तथ्य, टिप्पणियां और विश्लेषण सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध सूचनाओं, सरकारी बयानों तथा मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं। लेख का उद्देश्य केवल जनचर्चा और विषय पर विमर्श को बढ़ावा देना है।

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