बीमार भारत की भयावह तस्वीर : स्वास्थ्य मंत्रालय सोता रहा, जनता बीमारी ढोती रही

admin
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  • राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण ने खोली पोल, कुपोषण, अव्यवस्था और प्रश्नपत्र माफिया के साये में स्वास्थ्य तंत्र
  • भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था पर राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कुपोषण, रक्ताल्पता, निजी अस्पतालों का बढ़ता व्यावसायीकरण और चिकित्सा शिक्षा में अनियमितताओं की पड़ताल।

दिल्ली रितेश सिन्हा । भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। राजमार्गों का विस्तार हो रहा है, रेलवे का आधुनिकीकरण हो रहा है, बंदरगाह विकसित हो रहे हैं और वैश्विक मंचों पर भारत की उपस्थिति लगातार मजबूत हो रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विकसित भारत का लक्ष्य सामने रख चुके हैं। लेकिन किसी भी राष्ट्र की असली ताकत केवल उसकी अर्थव्यवस्था नहीं होती, बल्कि उसके नागरिकों का स्वास्थ्य होता है। यदि जनता बीमार हो, बच्चे कुपोषित हों और अस्पतालों की व्यवस्था चरमराई हुई हो, तो विकास के दावों की चमक फीकी पड़ जाती है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की नवीनतम रिपोर्ट ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की एक चिंताजनक तस्वीर सामने रखी है। रिपोर्ट के कुछ आँकड़े सुधार का संकेत देते हैं, लेकिन गहराई से देखने पर स्पष्ट होता है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में अभी भी अनेक गंभीर समस्याएँ मौजूद हैं।

सरकारी दावों और जमीनी वास्तविकता के बीच का अंतर आज भी साफ दिखाई देता है।

रिपोर्ट के अनुसार संस्थागत प्रसव बढ़कर 90.6 प्रतिशत तक पहुँच गया है। यह निश्चित रूप से एक सकारात्मक उपलब्धि है। लेकिन दूसरी ओर शल्य प्रसव का प्रतिशत बढ़कर 27.2 हो गया है। निजी चिकित्सालयों में यह आँकड़ा 54.1 प्रतिशत तक पहुँच चुका है। अर्थात दो में से एक प्रसव शल्य चिकित्सा के माध्यम से हो रहा है। यह स्थिति केवल चिकित्सकीय आवश्यकता का परिणाम नहीं मानी जा सकती। इससे स्वास्थ्य सेवाओं के बढ़ते व्यावसायीकरण पर भी प्रश्न उठते हैं।

सबसे अधिक चिंता बच्चों की स्थिति को लेकर है। रिपोर्ट बताती है कि 5 वर्ष से कम आयु के 29.3 प्रतिशत बच्चे अब भी अवरुद्ध शारीरिक विकास की समस्या से प्रभावित हैं। सरल शब्दों में कहें तो देश का लगभग हर तीसरा बच्चा कुपोषण की मार झेल रहा है। यह स्थिति उस समय और अधिक चिंताजनक हो जाती है जब भारत स्वयं को विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में शामिल करने का दावा कर रहा हो। महिलाओं में रक्ताल्पता की समस्या भी गंभीर बनी हुई है।

करोड़ों महिलाएँ और किशोरियाँ पर्याप्त पोषण प्राप्त नहीं कर पा रही हैं। गर्भवती महिलाओं में रक्त की कमी का स्तर अब भी चिंताजनक माना जाता है। इसका सीधा प्रभाव मातृ स्वास्थ्य और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर पड़ता है। यह केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि पोषण और प्रशासनिक प्राथमिकताओं का भी प्रश्न है।
एक ओर देश कुपोषण से लड़ रहा है तो दूसरी ओर मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी जीवनशैली जनित बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। यह विरोधाभासी स्थिति बताती है कि भारत दोहरी स्वास्थ्य चुनौती का सामना कर रहा है। एक वर्ग पर्याप्त भोजन और पोषण से वंचित है, जबकि दूसरा वर्ग असंतुलित जीवनशैली के कारण गंभीर बीमारियों की गिरफ्त में आ रहा है।

यदि स्वास्थ्य व्यवस्था वास्तव में मजबूत हो चुकी है तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि सरकारी चिकित्सालयों में आज भी लंबी कतारें क्यों दिखाई देती हैं। क्यों लाखों लोग निजी चिकित्सालयों में उपचार के लिए अपनी जीवनभर की कमाई खर्च करने को मजबूर हैं। क्यों जिला चिकित्सालयों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों के पद वर्षों से रिक्त पड़े हैं। इन प्रश्नों का उत्तर केवल आँकड़ों से नहीं दिया जा सकता।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वास्थ्य क्षेत्र में अनेक महत्वपूर्ण योजनाएँ आरम्भ की हैं, आयुष्मान भारत, जन औषधि केंद्र, चिकित्सा महाविद्यालयों का विस्तार और नए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थानों की स्थापना जैसे कदम इसी दिशा में उठाए गए हैं। इन योजनाओं की मंशा पर प्रश्न नहीं उठाए जा सकते। लेकिन इन योजनाओं का प्रभाव उतना व्यापक नहीं दिखाई देता जितनी अपेक्षा की गई थी।

यहीं स्वास्थ्य मंत्रालय और प्रशासनिक तंत्र पर प्रश्न खड़े होते हैं। नीति बनाना और उसका प्रभावी क्रियान्वयन करना दो अलग बातें हैं। यदि योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुँच रहा, तो इसका अर्थ है कि व्यवस्था में कहीं न कहीं गंभीर कमी मौजूद है। स्वास्थ्य मंत्रालय का मूल्यांकन विज्ञापनों और घोषणाओं से नहीं, बल्कि अस्पतालों की स्थिति और जनता के अनुभवों से होना चाहिए।

स्वास्थ्य क्षेत्र की एक बड़ी समस्या नौकरशाही का बढ़ता प्रभाव भी है। बैठकों, समीक्षाओं और प्रस्तुतियों की कोई कमी नहीं दिखाई देती, लेकिन जमीनी स्तर पर सुधार की गति बहुत धीमी है। अनेक बार ऐसा प्रतीत होता है कि वास्तविक समस्याओं का समाधान करने के बजाय उन्हें कागजों और आँकड़ों में छिपाने का प्रयास किया जाता है। यही कारण है कि जनता और सरकारी दावों के बीच विश्वास का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है।

देश की स्वास्थ्य व्यवस्था का भविष्य चिकित्सा शिक्षा पर निर्भर करता है। लेकिन जब चिकित्सक बनने की सबसे महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षा ही विवादों और प्रश्नपत्र चोरी के आरोपों से घिर जाए, तो स्थिति और चिंताजनक हो जाती है। हाल के वर्षों में प्रवेश परीक्षाओं से जुड़े अनेक विवाद सामने आए हैं। जाँच एजेंसियों द्वारा की गई कार्रवाई और न्यायपालिका की टिप्पणियों ने यह स्पष्ट किया है कि परीक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाने की आवश्यकता है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि चयन प्रक्रिया पर ही विश्वास कमजोर पड़ जाए तो देश को योग्य चिकित्सक कैसे मिलेंगे। चिकित्सा शिक्षा में भ्रष्टाचार, दलाली और अनियमितताओं का प्रभाव अंततः पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर पड़ता है। जिस व्यवस्था से चिकित्सक निकलेंगे, उसी व्यवस्था की गुणवत्ता भविष्य की चिकित्सा सेवाओं का स्तर तय करेगी।

विकसित देशों ने स्वास्थ्य को राष्ट्र निर्माण का आधार बनाया है। जापान, जर्मनी, फ्रांस और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत किया, स्वास्थ्य पर सार्वजनिक निवेश बढ़ाया और बीमारी के उपचार से अधिक उसकी रोकथाम पर बल दिया। भारत ने भी प्रगति की है, लेकिन अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना बाकी है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण ने केवल आँकड़े प्रस्तुत नहीं किए हैं, बल्कि शासन व्यवस्था के सामने एक आईना भी रखा है। यह आईना दिखाता है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में उपलब्धियों का ढोल पीटने से समस्याएँ समाप्त नहीं होतीं। जब तक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला चिकित्सालयों तक जवाबदेही तय नहीं होगी, जब तक रिक्त पद नहीं भरेंगे, जब तक पोषण योजनाओं का लाभ वास्तव में जरूरतमंदों तक नहीं पहुँचेगा और जब तक चिकित्सा शिक्षा को भ्रष्टाचार तथा परीक्षा माफियाओं से मुक्त नहीं किया जाएगा, तब तक सुधार के दावे अधूरे ही रहेंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकसित भारत का जो लक्ष्य रखा है, उसकी सबसे मजबूत नींव स्वस्थ भारत ही हो सकता है। लेकिन यदि स्वास्थ्य मंत्रालय आत्ममुग्धता में डूबा रहे, नौकरशाही फाइलों के जंगल में उलझी रहे और जमीनी समस्याओं को आँकड़ों की चमक से ढकने का प्रयास किया जाता रहे, तो यह लक्ष्य कमजोर पड़ जाएगा। समय की माँग है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में केवल योजनाओं की घोषणा नहीं, बल्कि परिणामों की राजनीति हो। क्योंकि बीमार नागरिकों के कंधों पर विकसित भारत का सपना अधिक दूर तक नहीं चल सकता।

 

डिस्क्लेमर:
यह लेख रितेश सिन्हा के व्यक्तिगत विचार, विश्लेषण और समसामयिक आर्थिक परिस्थितियों की उनकी समझ पर आधारित है। लेख में व्यक्त मत आवश्यक नहीं कि किसी समाचार संस्था, संगठन या प्रकाशक के आधिकारिक विचार हों। इसमें उल्लिखित तथ्य, टिप्पणियां और विश्लेषण सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध सूचनाओं, सरकारी बयानों तथा मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं। लेख का उद्देश्य केवल जनचर्चा और विषय पर विमर्श को बढ़ावा देना है।

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