अरब सागर से लेकर गंगा सागर तक केसरिया बहार
दिलीप घोष, अग्निमित्रा पॉल, अशोक कीर्तनिया, खुदीराम टुडू, निशीथ प्रमाणिक भी बने मंत्री कोलकाता
रितेश सिन्हा। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की जयंती के अवसर पर शनिवार को कोलकाता का ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड ग्राउंड पश्चिम बंगाल की राजनीति के सबसे बड़े सत्ता परिवर्तन का साक्षी बना। वर्षों तक वामपंथ और फिर तृणमूल कांग्रेस की राजनीति के केंद्र रहे बंगाल में अब भारतीय जनता पार्टी ने शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में अपनी सरकार का गठन कर दिया। लाखों लोगों की मौजूदगी, “जय श्रीराम” और “वंदे मातरम्” के नारों के बीच शुभेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। यह केवल सरकार बदलने का समारोह नहीं था, बल्कि बंगाल की राजनीतिक संस्कृति में एक बड़े वैचारिक परिवर्तन का प्रदर्शन भी था।
भाजपा ने इस आयोजन को “नए बंगाल” के उद्घोष के रूप में प्रस्तुत किया। मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, केंद्र सरकार के कई मंत्री, एनडीए शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और देशभर से आए वरिष्ठ नेता उपस्थित रहे। ब्रिगेड परेड ग्राउंड में उमड़ी भीड़ भाजपा के आत्मविश्वास का प्रतीक दिखाई दी। बंगाल के सुपरस्टार मिथुन चक्रवर्ती के मंच पर पहुंचते ही पूरा मैदान उत्साह से गूंज उठा। भाजपा समर्थकों ने इसे “सोनार बांग्ला के नए अध्याय” की शुरुआत बताया। कार्यक्रम की शुरुआत गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर को श्रद्धांजलि अर्पित कर की गई। मंच से बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रवाद को जोड़ने का प्रयास साफ दिखाई दिया।
राज्यपाल आर. एन. रवि ने मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। समारोह का सबसे भावुक क्षण तब आया, जब 97 वर्षीय माखनलाल सरकार को मंच पर बुलाया गया। सिलीगुड़ी निवासी माखनलाल सरकार भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सहयोगियों में रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंच पर जाकर उन्हें गले लगाया और उनका सम्मान किया। भाजपा कार्यकर्ताओं ने इसे जनसंघ से भाजपा तक की वैचारिक यात्रा का सम्मान बताया। शुभेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री बनना बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा उलटफेर माना जा रहा है। कभी ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में शामिल रहे शुभेंदु ने नंदीग्राम आंदोलन से अपनी राजनीतिक पहचान बनाई थी।
वाममोर्चा सरकार के खिलाफ भूमि आंदोलन ने उन्हें राज्य राजनीति का बड़ा चेहरा बना दिया। तृणमूल कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने संगठन और चुनावी रणनीति दोनों में अपनी मजबूत पकड़ दिखाई। लेकिन समय के साथ ममता बनर्जी और अधिकारी परिवार के बीच दूरी बढ़ती गई। भाजपा में शामिल होने के बाद शुभेंदु अधिकारी ने खुद को हिंदुत्व, बंगाली अस्मिता और संगठनात्मक संघर्ष के संयुक्त चेहरे के रूप में स्थापित किया। नंदीग्राम में ममता बनर्जी को हराने के बाद उनका राजनीतिक कद राष्ट्रीय स्तर पर और बढ़ गया। भाजपा नेतृत्व ने उन्हें बंगाल में पार्टी का सबसे मजबूत जनाधार वाला नेता माना।
मुख्यमंत्री के रूप में उनकी छवि एक ऐसे नेता की है, जो संगठन, सड़क संघर्ष और प्रशासनिक नियंत्रण — तीनों में संतुलन साधने की क्षमता रखते हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा ने बंगाल में ओबीसी, मतुआ, आदिवासी और शहरी हिंदू मतदाताओं को एक साथ जोड़ने की रणनीति शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में सफलतापूर्वक लागू की। पूर्व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से आने वाले दिलीप घोष ने बंगाल में भाजपा संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। उनकी राजनीति हमेशा आक्रामक हिंदुत्व और जमीनी कार्यकर्ता आधारित संगठन पर केंद्रित रही। रेल कॉलोनियों से लेकर ग्रामीण बंगाल तक भाजपा का विस्तार करने में दिलीप घोष की बड़ी भूमिका मानी जाती है।
फैशन डिजाइनर से राजनीति में आईं अग्निमित्रा पॉल को मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई है। भाजपा ने उन्हें शिक्षित, आधुनिक और मुखर महिला नेतृत्व के रूप में आगे बढ़ाया। तृणमूल कांग्रेस सरकार पर महिला सुरक्षा और भ्रष्टाचार के मुद्दों को लेकर लगातार हमलावर रहीं अग्निमित्रा पॉल ने शहरी बंगाल में भाजपा की स्वीकार्यता बढ़ाने में भूमिका निभाई। उनकी नियुक्ति भाजपा के उस संदेश का हिस्सा मानी जा रही है, जिसमें पार्टी बंगाल की सांस्कृतिक पहचान और महिला सशक्तिकरण को साथ लेकर चलना चाहती है। कूचबिहार से आने वाले युवा नेता निशीथ प्रमाणिक को गृह राज्य मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई है। कम उम्र में राष्ट्रीय राजनीति में पहचान बनाने वाले निशीथ उत्तर बंगाल और राजबंशी समाज के प्रभावशाली चेहरे माने जाते हैं। उनकी राजनीति का केंद्र अवैध घुसपैठ, सीमा सुरक्षा और उत्तर बंगाल के विकास का मुद्दा रहा है।
भाजपा ने उन्हें सीमांत क्षेत्रों में अपने राजनीतिक विस्तार का प्रमुख चेहरा बनाया। जंगलमहल लंबे समय तक माओवादी हिंसा और राजनीतिक उपेक्षा का प्रतीक माना जाता रहा है। भाजपा ने पिछले कुछ वर्षों में आदिवासी क्षेत्रों में अपनी मजबूत पकड़ बनाई है। खुदीराम टुडू की नियुक्ति इसी सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। पंचायत राजनीति के रणनीतिकार अशोक कीर्तनिया लंबे समय तक संगठन में सक्रिय रहे, कीर्तनिया को भाजपा का शांत लेकिन प्रभावी रणनीतिकार माना जाता है। बंगाल की पंचायत राजनीति लंबे समय से हिंसा, संघर्ष और सत्ता वर्चस्व का केंद्र रही है। भाजपा ने उन्हें ग्रामीण ढांचे में संगठन मजबूत करने और पंचायत व्यवस्था में पारदर्शिता लाने की जिम्मेदारी दी है।
शपथ ग्रहण समारोह में भाजपा नेताओं ने बार-बार “सोनार बांग्ला” का उल्लेख किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि बंगाल अब केवल राजनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि विकास और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि यह सरकार प्रतिशोध की नहीं, परिवर्तन की सरकार होगी। गृह मंत्री अमित शाह ने इसे “भ्रष्टाचार, कटमनी और राजनीतिक हिंसा के खिलाफ जनता की जीत” बताया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बंगाल को राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक चेतना की भूमि बताते हुए कहा कि राज्य अब औद्योगिक पुनर्जागरण की ओर बढ़ेगा। राजनीतिक रूप से यह परिवर्तन जितना ऐतिहासिक है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी।
ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस अब विपक्ष की भूमिका में होंगी, लेकिन बंगाल की राजनीति में उनकी पकड़ को कम करके नहीं आंका जा सकता। भाजपा सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती कानून-व्यवस्था, उद्योग निवेश, बेरोजगारी और राजनीतिक हिंसा पर नियंत्रण की होगी। बंगाल लंबे समय से राजनीतिक ध्रुवीकरण का केंद्र रहा है। शुभेंदु अधिकारी के सामने यह भी चुनौती होगी कि वे भाजपा के आक्रामक राजनीतिक ढांचे और बंगाल की पारंपरिक “भद्रलोक” संस्कृति के बीच संतुलन कैसे स्थापित करते हैं। ब्रिगेड परेड ग्राउंड से निकली यह तस्वीर केवल सत्ता परिवर्तन की नहीं थी। यह उस राजनीतिक कथा का नया अध्याय था, जिसमें भाजपा अब बंगाल में हाशिए की पार्टी नहीं, बल्कि सत्ता का केंद्र बन चुकी है।
अरब सागर से लेकर गंगा सागर तक फैले भाजपा के राजनीतिक विस्तार में बंगाल की यह जीत प्रतीकात्मक और रणनीतिक — दोनों दृष्टियों से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की धरती पर भगवा सत्ता का यह उदय भारतीय राजनीति को नया संदेश दे रहा है कि बंगाल, जिसे कभी भाजपा के लिए सबसे कठिन राजनीतिक किला माना जाता था, अब उसी पार्टी की सबसे बड़ी वैचारिक प्रयोगशाला बनता दिखाई दे रहा है।

