- ‘छिन’ रहा है 24 अकबर रोड, नेतृत्व पर उठे गंभीर सवाल
रितेश सिन्हा- नई दिल्ली। 24 अकबर रोड—जो कभी देश की राजनीति का धड़कता केंद्र हुआ करता था—आज खुद कांग्रेस की गिरती स्थिति का प्रतीक बनता नजर आ रहा है। यह महज एक भवन का मामला नहीं, बल्कि उस राजनीतिक दल की स्थिति का आईना है, जिसने दशकों तक देश की सत्ता को दिशा दी।
सिर्फ नोटिस नहीं, राजनीतिक संकेत
24 अकबर रोड पर मंडराता संकट किसी साधारण प्रशासनिक नोटिस का परिणाम नहीं है। यह उस स्थिति का परिणाम है, जहां पार्टी समय रहते न तो सक्रिय हुई और न ही इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से प्रभावी ढंग से उठाया। सवाल साफ है—
क्या कांग्रेस से उसका घर छीना जा रहा है, या उसने खुद ही उसे छोड़ दिया है?नेतृत्व और रणनीति पर सवाल
कांग्रेस के पास अनुभवी नेताओं और विधिवेत्ताओं की लंबी सूची रही है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में कोई ठोस कानूनी या राजनीतिक लड़ाई सामने नहीं आई। यह स्थिति केवल चूक नहीं, बल्कि रणनीतिक निष्क्रियता को दर्शाती है।
पार्टी का थिंक टैंक भी अब एक सीमित दायरे में सिमटता दिख रहा है, जहां जमीनी हकीकत के बजाय आंतरिक धारणाएं हावी हैं। आत्ममंथन की कमी और निर्णय प्रक्रिया की अस्पष्टता ने संकट को और गहरा किया है।
वरिष्ठ नेताओं की चुप्पी
मल्लिकार्जुन खड़गे, अशोक गहलोत, अजय माकन, भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कमलनाथ जैसे अनुभवी नेताओं की इस मुद्दे पर सीमित सक्रियता कई सवाल खड़े करती है।
न कोई सामूहिक रणनीति दिखी, न ही आक्रामक राजनीतिक रुख—यह स्थिति संस्थागत विफलता की ओर इशारा करती है।गांधी परिवार की चुप्पी
सबसे बड़ा सवाल गांधी परिवार की भूमिका को लेकर है।
न राहुल गांधी की स्पष्ट प्रतिक्रिया, न सोनिया गांधी की सक्रियता और न ही प्रियंका गांधी का हस्तक्षेप—यह चुप्पी कई संकेत देती है।राजनीति में चुप्पी भी एक संदेश होती है, और यहां यह संदेश कमजोरी और अनिर्णय का प्रतीत होता है।
भाजपा की रणनीतिक बढ़त
दूसरी ओर, भाजपा ने इस पूरे घटनाक्रम को नियमों और प्रक्रियाओं के जरिए शांत तरीके से संभाला। बिना टकराव के कांग्रेस को ऐसी स्थिति में ला दिया गया, जहां उसके विकल्प सीमित हो गए।
यह आधुनिक राजनीति की वह रणनीति है, जहां बिना शोर किए भी निर्णायक बढ़त हासिल की जाती है।इतिहास से नहीं लिया सबक
कांग्रेस के इतिहास में कई बड़े मोड़ आए—1969 का विभाजन, 1977 की हार, 1989 के बाद का संकट और 2014 के बाद का वैचारिक भ्रम।
लेकिन हर बार पार्टी ने संकेतों को या तो देर से समझा या गलत आंका। 24 अकबर रोड का संकट उसी क्रम की अगली कड़ी बनता दिख रहा है।असली सवाल अब भी बाकी
यह मुद्दा सिर्फ एक इमारत का नहीं है, बल्कि कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे, नेतृत्व क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति का परीक्षण है।
अब सवाल यह है:
- क्या कांग्रेस इससे सबक लेगी?
- क्या थिंक टैंक और नेतृत्व में बदलाव होगा?
- क्या पार्टी फिर से संघर्ष की इच्छा दिखाएगी?
निष्कर्ष
यदि इन सवालों के जवाब नकारात्मक रहे, तो 24 अकबर रोड सिर्फ शुरुआत होगी।
कांग्रेस केवल एक भवन नहीं खो रही, बल्कि अपनी पहचान, विश्वसनीयता और राजनीतिक ऊर्जा भी दांव पर लगी है।राजनीति का कठोर सच यही है—
जब कोई दल संघर्ष की इच्छा खो देता है, तो इतिहास उससे केवल सत्ता ही नहीं, उसके प्रतीक भी छीन लेता है।
कांग्रेस से हुई ऐतिहासिक चूक

- ‘छिन’ रहा है 24 अकबर रोड, नेतृत्व पर उठे गंभीर सवाल
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