डीके का विकास मॉडल : कर्नाटक को नई आर्थिक उड़ान देने की तैयारी

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कर्नाटक में निवेश, रोजगार और बेंगलुरु से बाहर आर्थिक विस्तार पर डीके शिवकुमार सरकार का फोकस

बेंगलुरु से बाहर निवेश और रोजगार का विस्तार, कर्नाटक में विकास की नई पटकथा

रितेश सिन्हा नई दिल्ली। कर्नाटक में डी.के. शिवकुमार के मुख्यमंत्री के रूप में पहले 100 दिन पूरे होने के साथ राज्य की राजनीति में विकास और अर्थव्यवस्था का सवाल एक बार फिर केंद्र में है। 3 जून 2026 को मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद सरकार ने निवेश, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, तकनीक, कृषि, सहकारिता और क्षेत्रीय संतुलन को एक साथ जोड़कर विकास का एक व्यापक खाका सामने रखा है। सौ दिन किसी सरकार के कामकाज का अंतिम मूल्यांकन करने के लिए पर्याप्त नहीं होते, लेकिन इस अवधि में घोषित लक्ष्य और नीतियां यह संकेत जरूर देती हैं कि सरकार आने वाले वर्षों में कर्नाटक की आर्थिक क्षमता को किस दिशा में ले जाना चाहती है।

Contents
2037 तक 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्यडेटा बैंक, स्वास्थ्य अधोसंरचना और सहकारी क्षेत्रनिवेश के मोर्चे पर सरकार की रणनीति‘बियॉन्ड बेंगलुरु’ से क्षेत्रीय आर्थिक विस्तारऔद्योगिक क्लस्टर और विनिर्माण पर जोररोजगार सृजन सरकार की बड़ी कसौटीस्वास्थ्य अधोसंरचना और डिजिटल चिकित्साडेटा बैंक और भूमि रिकॉर्ड का डिजिटलीकरणशिक्षा और एआई पर सरकार का फोकसकृषि और सहकारिता को विकास मॉडल से जोड़ने की कोशिशबेंगलुरु की बुनियादी सुविधाएं भी बड़ी चुनौतीपांच गारंटी और पूंजीगत निवेश के बीच वित्तीय संतुलनकृषि और जल संकट सरकार के सामने चुनौतीकेंद्र के साथ संवाद और राज्य के आर्थिक हित100 दिनों के बाद असली परीक्षा अब शुरूकल्याणकारी राजनीति और आर्थिक विस्तार का मॉडलकर्नाटक के विकास मॉडल की असली कसौटी

2037 तक 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य

इस एजेंडे का सबसे बड़ा लक्ष्य 2037 तक कर्नाटक को 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना है। सरकार ने इसके लिए नौ सूत्रीय ‘नव संकल्प’ में रोजगार, बुनियादी ढांचा, शिक्षा, स्वास्थ्य और क्षेत्रीय विकास को प्रमुखता दी है। अगले 500 दिनों में 1.5 लाख करोड़ रुपये के पूंजी निवेश और 3 लाख करोड़ रुपये के नए निवेश को आकर्षित करने का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही 1 लाख सरकारी नियुक्तियों और निजी क्षेत्र में 5 लाख रोजगार सृजित करने की योजना सामने आई है। ये लक्ष्य अपने आकार में बड़े हैं और इसलिए आने वाले समय में इनकी वास्तविक परीक्षा भी परियोजनाओं और रोजगार के धरातल पर होगी।

डेटा बैंक, स्वास्थ्य अधोसंरचना और सहकारी क्षेत्र

हमसे विशेष बातचीत में डेटा बैंक, स्वास्थ्य अधोसंरचना और सहकारी क्षेत्र जैसे विषयों पर भी विस्तार से चर्चा हुई। इन तीनों को आर्थिक विकास के व्यापक ढांचे से जोड़ना महत्वपूर्ण है। आधुनिक अर्थव्यवस्था में सरकार के पास जितना विश्वसनीय आंकड़ा होगा, नीति निर्माण उतना ही लक्ष्य आधारित हो सकेगा। किस जिले में कितने रोजगार हैं, कहां उद्योग के लिए जमीन उपलब्ध है, किस क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है, किसानों की उत्पादन क्षमता क्या है और सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ किस वर्ग तक पहुंच रहा है—ऐसी जानकारी विकास नीति को अधिक प्रभावी बनाने में मदद कर सकती है।

निवेश के मोर्चे पर सरकार की रणनीति

निवेश के मोर्चे पर पहले 100 दिनों में 43,214 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों को मंजूरी दिए जाने का सरकार ने दावा किया है। इसके अलावा पिछले तीन वर्षों में 2.53 लाख करोड़ रुपये के निवेश के साकार होने और छह लाख से अधिक संभावित रोजगार का भी दावा सामने आया है। लेकिन प्रस्तावित निवेश और वास्तविक निवेश के बीच अंतर को समझना जरूरी है। किसी परियोजना की घोषणा या मंजूरी उसके जमीन पर उतरने की गारंटी नहीं होती। निर्माण, उत्पादन और स्थायी रोजगार के आंकड़े ही निवेश नीति के वास्तविक परिणाम बताएंगे।

‘बियॉन्ड बेंगलुरु’ से क्षेत्रीय आर्थिक विस्तार

कर्नाटक के आर्थिक मॉडल में ‘बियॉन्ड बेंगलुरु’ की अवधारणा महत्वपूर्ण है। राज्य की वैश्विक आर्थिक पहचान लंबे समय से बेंगलुरु की सूचना-प्रौद्योगिकी और सेवा अर्थव्यवस्था से जुड़ी रही है। अब मैसूरु, मंगलुरु, हुब्बली-धारवाड़, बेलगावी और कलबुर्गी जैसे शहरों को नए आर्थिक केंद्रों के रूप में विकसित करने की योजना है। पांच नए प्रमुख शहरों के विकास और पिछड़े तालुकों के लिए निवेश प्रोत्साहन पैकेज की योजना आर्थिक गतिविधियों को राजधानी से बाहर ले जाने का प्रयास है। इसका आर्थिक असर रोजगार और उद्योग पर पड़ेगा, जबकि राजनीतिक असर क्षेत्रीय संतुलन के रूप में दिखाई दे सकता है।

औद्योगिक क्लस्टर और विनिर्माण पर जोर

डोड्डाबल्लापुर में लगभग 4,000 एकड़ में 20,000 करोड़ रुपये के औद्योगिक क्लस्टर की योजना इसी रणनीति का उदाहरण है। रक्षा उत्पादन, विमानन, इलेक्ट्रॉनिक्स, जैव-प्रौद्योगिकी, हरित ऊर्जा, कपड़ा और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों को बढ़ावा देने की कोशिश अर्थव्यवस्था को केवल सूचना-प्रौद्योगिकी पर निर्भर रखने के बजाय बहु-क्षेत्रीय बनाने की दिशा में है। कर्नाटक पहले से ही तकनीक और सेवा क्षेत्र में मजबूत है, लेकिन विनिर्माण का विस्तार रोजगार के नए अवसर पैदा करने के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा।

रोजगार सृजन सरकार की बड़ी कसौटी

रोजगार इस पूरी रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक पक्ष है। सरकार ने 1 लाख सरकारी नियुक्तियों और निजी क्षेत्र में 5 लाख रोजगार का लक्ष्य रखा है। उद्योग और युवाओं के बीच संपर्क बढ़ाने के लिए रोजगार मंचों तथा ‘उद्योग सेतु’ जैसी पहलों की बात कही गई है। बेंगलुरु के बाहर पैदा होने वाले प्रत्येक निजी रोजगार के लिए 2,500 रुपये तक के प्रोत्साहन का प्रस्ताव भी रखा गया है। हालांकि आने वाले समय में रोजगार की संख्या के साथ उसकी गुणवत्ता, स्थायित्व और आय का स्तर भी महत्वपूर्ण कसौटी होगा।

स्वास्थ्य अधोसंरचना और डिजिटल चिकित्सा

स्वास्थ्य अधोसंरचना को भी विकास नीति से जोड़ा गया है। 162 सरकारी अस्पतालों में लगभग 40.50 करोड़ रुपये की डिजिटल रेडियोग्राफी परियोजना और 185 केंद्रों को जोड़ने वाले टेली-आईसीयू नेटवर्क जैसी योजनाएं ग्रामीण तथा अर्धशहरी क्षेत्रों में विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाओं की पहुंच बढ़ाने की कोशिश हैं। स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च केवल कल्याणकारी व्यय नहीं, बल्कि उत्पादक मानव संसाधन में निवेश भी है। यदि जिला और तालुक स्तर पर बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध होती हैं, तो इसका प्रभाव परिवारों के खर्च, श्रम उत्पादकता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

डेटा बैंक और भूमि रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण

डेटा बैंक की अवधारणा इसी मॉडल का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा है। कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, उद्योग, रोजगार, भूमि और स्थानीय निकायों से जुड़े आंकड़ों को एकीकृत करने से योजनाओं की निगरानी और संसाधनों के बेहतर आवंटन की संभावना बढ़ सकती है। भूमि प्रशासन में भी बड़े पैमाने पर डिजिटलीकरण का लक्ष्य रखा गया है। बेंगलुरु के लगभग 26 लाख संपत्ति अभिलेखों को डिजिटल बनाने और पूरे राज्य में एक करोड़ से अधिक भूमि अभिलेखों पर ‘फोड़ी’ प्रक्रिया आगे बढ़ाने की योजना बताई गई है। निवेश के लिए जमीन संबंधी स्पष्टता महत्वपूर्ण है और इसलिए भूमि रिकॉर्ड का आधुनिकीकरण आर्थिक सुधार से भी जुड़ जाता है।

शिक्षा और एआई पर सरकार का फोकस

शिक्षा और तकनीक के मोर्चे पर छठी कक्षा से कृत्रिम बुद्धिमत्ता की शिक्षा, सरकारी एआई विश्वविद्यालय, एआई हब और तकनीकी पाठ्यक्रमों जैसी पहल प्रस्तावित हैं। 1,000 सरकारी स्कूलों को कर्नाटक पब्लिक स्कूलों के रूप में विकसित करने का लक्ष्य भी रखा गया है। ग्रामीण सरकारी स्कूलों से आने वाले विद्यार्थियों के उच्च शिक्षा अवसर बढ़ाने के लिए 7.5 प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव सामने आया है। कर्नाटक की तकनीकी अर्थव्यवस्था को देखते हुए शिक्षा और कौशल को भविष्य के रोजगार बाजार से जोड़ना राज्य की दीर्घकालीन आर्थिक रणनीति का अहम हिस्सा हो सकता है।

कृषि और सहकारिता को विकास मॉडल से जोड़ने की कोशिश

कृषि और सहकारिता के बिना यह विकास मॉडल अधूरा रहेगा। ‘मुख्यमंत्री नेगिला योगी’ के तहत छोटे किसानों को कृषि मशीनरी उपलब्ध कराने के लिए सहायता का प्रावधान किया गया है। पायलट चरण में 31 तालुकों को शामिल किया गया है और विस्तार की स्थिति में करीब 59 लाख छोटे जोत वाले किसानों तक पहुंच का लक्ष्य बताया गया है। सहकारी क्षेत्र में दुग्ध उत्पादन, कृषि ऋण, भंडारण, प्रसंस्करण और विपणन को तकनीक और बाजार से जोड़ना ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मूल्यवर्धन बढ़ा सकता है। इससे किसानों और उत्पादकों को केवल कच्चे माल के आपूर्तिकर्ता के बजाय मूल्य श्रृंखला का हिस्सा बनाने की संभावना बढ़ती है।

बेंगलुरु की बुनियादी सुविधाएं भी बड़ी चुनौती

बेंगलुरु की बुनियादी सुविधाएं सरकार की एक अलग और बड़ी चुनौती हैं। शहर की वैश्विक आर्थिक पहचान के साथ यातायात, सड़क, जल और शहरी नियोजन की समस्याएं भी जुड़ी हैं। पहले 100 दिनों में सड़कों के लिए 2,000 करोड़ रुपये मंजूर किए जाने की जानकारी दी गई है। पांच बड़े हरित क्षेत्र और सात झीलों के पुनर्जीवन की योजना भी सामने आई है। सार्वजनिक परिवहन और शहरी गतिशीलता को एकीकृत करने के प्रयास इसी व्यापक शहरी सुधार एजेंडे का हिस्सा हैं।

पांच गारंटी और पूंजीगत निवेश के बीच वित्तीय संतुलन

राजनीतिक स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण सवाल कांग्रेस की पांच गारंटी योजनाओं और बड़े पूंजीगत निवेश के बीच वित्तीय संतुलन का है। सरकार के अनुसार इन योजनाओं पर अब तक 1,45,416 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। गृहलक्ष्मी के तहत 1.24 करोड़ महिलाओं और गृह ज्योति के तहत 1.67 करोड़ परिवारों को लाभ मिलने का दावा किया गया है। अन्न भाग्य के 4.44 करोड़ लाभार्थियों और शक्ति योजना के तहत महिलाओं की 821 करोड़ मुफ्त बस यात्राओं का आंकड़ा भी सरकार ने प्रस्तुत किया है। ऐसे में आने वाले वर्षों में कल्याणकारी योजनाओं, राजस्व और पूंजीगत निवेश के बीच संतुलन आर्थिक नीति का महत्वपूर्ण मुद्दा रहेगा।

कृषि और जल संकट सरकार के सामने चुनौती

कृषि और जल संकट फिलहाल सरकार के सामने तत्काल चुनौती है। 2026 में 177 तालुकों को सूखा प्रभावित घोषित किया गया। राज्य ने केंद्र से 3,705.30 करोड़ रुपये की सहायता मांगी और प्रभावित किसानों के लिए 2,500 रुपये की इनपुट सहायता घोषित की। यह स्थिति बताती है कि 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य केवल उद्योग और तकनीक के सहारे हासिल नहीं होगा। कावेरी, कृष्णा, महादयी और मेकेदाटु जैसे जल संबंधी प्रश्न कृषि, पेयजल, उद्योग और शहरी विस्तार की दीर्घकालीन जरूरतों से जुड़े हैं।

केंद्र के साथ संवाद और राज्य के आर्थिक हित

राजनीतिक रूप से शिवकुमार की कार्यशैली का एक और पहलू दिल्ली के साथ सक्रिय संवाद है। रक्षा, जल संसाधन, बुनियादी ढांचा और निवेश जैसे विषयों पर केंद्र के साथ बातचीत को राज्य के आर्थिक हितों से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है। करीब चार दशक की राजनीति में संगठन और चुनावी प्रबंधन का लंबा अनुभव रखने वाले शिवकुमार के लिए मुख्यमंत्री पद की भूमिका आर्थिक नीति और राष्ट्रीय स्तर के संवाद का भी नया क्षेत्र है। दक्षिण भारत की राजनीति में राज्य-केंद्र संबंध अक्सर राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं, ऐसे में आर्थिक मुद्दों पर संवाद का बढ़ना कर्नाटक की राजनीति को एक अलग आयाम देता है।

100 दिनों के बाद असली परीक्षा अब शुरू

फिर भी सौ दिन को उपलब्धियों का अंतिम प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। 43,214 करोड़ रुपये के निवेश अनुमोदनों को वास्तविक परियोजनाओं में बदलना, अगले 500 दिनों में 1.5 लाख करोड़ रुपये के पूंजी निवेश का लक्ष्य हासिल करना, 5 लाख निजी रोजगार पैदा करना, 177 सूखा प्रभावित तालुकों में राहत पहुंचाना, बेंगलुरु की यातायात समस्या कम करना और स्वास्थ्य तथा शिक्षा की डिजिटल योजनाओं को गांवों तक पहुंचाना—ये वे कसौटियां हैं जिन पर आने वाले महीनों में सरकार की दिशा और गति स्पष्ट होगी।

कल्याणकारी राजनीति और आर्थिक विस्तार का मॉडल

कर्नाटक में सामने आया विकास मॉडल इसलिए राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है कि इसमें कल्याणकारी राजनीति और आर्थिक विस्तार को साथ रखने की कोशिश की जा रही है। पांच गारंटियों के जरिए सामाजिक सुरक्षा, निवेश के जरिए आर्थिक विस्तार, रोजगार के जरिए युवाओं को अवसर, डेटा बैंक के जरिए प्रशासनिक दक्षता, स्वास्थ्य और शिक्षा के जरिए मानव पूंजी तथा सहकारिता और कृषि के जरिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक ही ढांचे में जोड़ने का प्रयास है।

कर्नाटक के विकास मॉडल की असली कसौटी

पहले 100 दिनों के आंकड़े महत्वाकांक्षा का आकार जरूर बताते हैं—43,214 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव, 1.5 लाख करोड़ रुपये का आगामी पूंजी निवेश लक्ष्य, 3 लाख करोड़ रुपये के नए निवेश की योजना, 1 लाख सरकारी नियुक्तियां, 5 लाख निजी रोजगार, 2037 तक 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था, 1,000 सरकारी स्कूलों का उन्नयन, 162 अस्पतालों में डिजिटल रेडियोग्राफी और 177 सूखा प्रभावित तालुक। अब असली सवाल इन आंकड़ों को जमीन पर परिणाम में बदलने का है। निवेश कारखानों में, कारखाने रोजगार में, डेटा बेहतर शासन में, स्वास्थ्य ढांचा बेहतर सेवाओं में और सहकारी व्यवस्था किसानों की आय में बदलती है या नहीं—कर्नाटक के इस नए विकास मॉडल की वास्तविक कहानी इन्हीं परिणामों से लिखी जाएगी।

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