2041 की क्षेत्रीय योजना की समीक्षा में खट्टर की कार्यशैली, अनियोजित शहरीकरण, घटती कृषि भूमि और रियल एस्टेट विस्तार पर उठ सकते हैं बड़े सवाल
रितेश सिन्हा दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) योजना बोर्ड की 16 जून 2026 को होने वाली बैठक केवल एक नियमित प्रशासनिक समीक्षा नहीं है। यह बैठक उस विकास मॉडल की भी परीक्षा बन सकती है जिसने पिछले एक दशक में दिल्ली, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से की भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक तस्वीर बदल दी है। वर्ष 2041 की क्षेत्रीय योजना की समीक्षा के दौरान गुरुग्राम, फरीदाबाद, सोनीपत, झज्जर और पलवल जैसे जिलों में हुए विकास की पड़ताल होगी, साथ ही यह प्रश्न भी उठ सकता है कि क्या एनसीआर-2041 का उद्देश्य संतुलित और टिकाऊ विकास था या फिर विकास की धुरी, धीरे-धीरे जमीन, निर्माण और रियल एस्टेट कारोबार के इर्द-गिर्द सिमटती चली गई।
दिल्ली का बोझ कम होना था, लेकिन संकट फैलता गया
एनसीआर-2041 का मूल उद्देश्य दिल्ली पर बढ़ते दबाव को कम करना, आसपास के क्षेत्रों में रोजगार और निवेश के अवसर पैदा करना, पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित करना तथा योजनाबद्ध शहरीकरण को बढ़ावा देना था; दिल्ली-एनसीआर दुनिया के सबसे प्रदूषित और भीड़भाड़ वाले शहरी क्षेत्रों में गिना जाता है, आखिर वर्षों की योजनाओं, बैठकों और हजारों करोड़ रुपये के निवेश के बावजूद अपेक्षित सुधार क्यों नहीं दिखाई देता।
दिल्ली आज दमघोंटू हवा, यातायात दबाव, अनियोजित विस्तार और संसाधनों पर बढ़ते बोझ से जूझ रही है। यदि क्षेत्रीय योजना का उद्देश्य दिल्ली का दबाव कम करना था तो फिर दिल्ली के आसपास के शहर भी उसी संकट की राह पर क्यों दिखाई दे रहे हैं? क्या समस्या का समाधान हुआ है या उसका विस्तार?
गुरुग्राम कभी आधुनिक भारत के शहरी विकास मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया गया था, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कार्यालय, गगनचुंबी इमारतें, लक्जरी टाउनशिप और अरबों रुपये का निवेश इसकी पहचान बने। दूसरी ओर जलभराव, प्रदूषण, यातायात अव्यवस्था, घटता भूजल स्तर और आधारभूत सुविधाओं की कमी भी उसी शहर की हकीकत है।
हर मानसून में गुरुग्राम की तस्वीरें यह सवाल खड़ा करती हैं कि क्या विकास केवल ऊंची इमारतों और महंगी परियोजनाओं का नाम है? यदि विकास इतना सुनियोजित था तो शहर आज भी बुनियादी चुनौतियों से क्यों जूझ रहा है? यही मॉडल अब सोनीपत, झज्जर और पलवल जैसे जिलों में भी तेजी से फैलता दिखाई दे रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में हरियाणा के एनसीआर क्षेत्र में भूमि उपयोग परिवर्तन की गति तेज हुई है। एक्सप्रेसवे, औद्योगिक गलियारों, लॉजिस्टिक्स हब और आवासीय परियोजनाओं के नाम पर कृषि भूमि का स्वरूप तेजी से बदला है। जिन क्षेत्रों में कभी खेती होती थी, वहां अब टाउनशिप, गोदाम और व्यावसायिक परियोजनाएं दिखाई देती हैं। भूमि की कीमतें बढ़ीं, निवेश बढ़ा, लेकिन इसके साथ कृषि योग्य भूमि का दायरा भी लगातार कम होता गया। कृषि विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि यदि उपजाऊ भूमि इसी गति से समाप्त होती रही तो भविष्य में खाद्य सुरक्षा, भूजल संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
कहानी केवल हरियाणा तक सीमित नहीं है। नोएडा, ग्रेटर नोएडा, यमुना प्राधिकरण क्षेत्र, गाजियाबाद, बागपत और मेरठ में भी भूमि बाजार लगातार गर्म हुआ है। नोएडा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र ने निवेशकों को आकर्षित किया है। यहां भी वही सवाल उठ रहे हैं जो कभी गुरुग्राम को लेकर उठे थे। क्या विकास की गति के साथ पर्यावरणीय संतुलन, जल संसाधन संरक्षण और सामाजिक अवसंरचना को भी समान महत्व दिया जा रहा है? या फिर जमीन आधारित विकास ही नीति का केंद्र बनता जा रहा है?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र योजना बोर्ड ने वर्षों में 360 से अधिक अवसंरचना परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान की। इन परियोजनाओं की कुल लागत 31,464 करोड़ रुपये से अधिक रही। बोर्ड ने 15,105 करोड़ रुपये से अधिक के ऋण स्वीकृत किए और हजारों करोड़ रुपये राज्यों को जारी भी किए।
इसके अतिरिक्त 84 परियोजनाओं के लिए लगभग 5,921 करोड़ रुपये की ऋण सहायता स्वीकृत की गई, जिनकी कुल लागत 9,000 करोड़ रुपये से अधिक थी। इन परियोजनाओं का उद्देश्य क्षेत्रीय संपर्क, जलापूर्ति, सीवरेज, परिवहन और शहरी सुविधाओं को बेहतर बनाना था। यदि इतने बड़े निवेश के बावजूद दिल्ली प्रदूषण से जूझ रही है, गुरुग्राम और फरीदाबाद अवसंरचनात्मक दबाव झेल रहे हैं और सार्वजनिक परिवहन अभी भी अपर्याप्त है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इन निवेशों का वास्तविक लाभ किसे मिला?
इस पूरी बहस के केंद्र में केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य मंत्री मनोहर लाल खट्टर भी हैं। हरियाणा में लगभग दस वर्ष तक मुख्यमंत्री रहने के बाद अब वे उसी मंत्रालय की कमान संभाल रहे हैं जिसे वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में 85,522 करोड़ रुपये का आवंटन मिला है। यह मंत्रालय देश की शहरी विकास नीतियों, आवास योजनाओं, शहरी परिवहन और एनसीआर से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण विषयों का संचालन करता है। ऐसे में 16 जून की बैठक को खट्टर की नीतिगत दृष्टि की समीक्षा के रूप में भी देखा जा रहा है।सवाल यह है कि जब मंत्रालय के पास 85 हजार करोड़ रुपये से अधिक का बजट है और एनसीआर योजना बोर्ड वर्षों से हजारों करोड़ रुपये की परियोजनाओं को वित्तीय सहायता देता रहा है, तब भी एनसीआर के नागरिकों को स्वच्छ हवा, बेहतर सार्वजनिक परिवहन, पर्याप्त हरित क्षेत्र और टिकाऊ शहरी जीवन क्यों नहीं मिल पा रहा?
सरकार ने इसे निवेश और रोजगार सृजन का आधार बताया
मनोहर लाल खट्टर के मुख्यमंत्री रहते हुए हरियाणा के एनसीआर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर भूमि उपयोग परिवर्तन, नई टाउनशिप और औद्योगिक परियोजनाओं को मंजूरी मिली। सरकार ने इसे निवेश और रोजगार सृजन का आधार बताया। आलोचकों का तर्क है कि विकास की प्राथमिकताओं में रियल एस्टेट विस्तार को अधिक महत्व मिला, जबकि पर्यावरण, सार्वजनिक परिवहन, जल संरक्षण और सामाजिक अवसंरचना अपेक्षाकृत पीछे छूट गए। यदि विकास मॉडल इतना सफल था तो गुरुग्राम, फरीदाबाद, सोनीपत और झज्जर जैसे क्षेत्रों में बढ़ता अवसंरचनात्मक दबाव किस ओर संकेत करता है?
यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि क्या विकास का अर्थ केवल बढ़ती जमीन कीमतें और निर्माण गतिविधियां हैं या नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार भी उसका हिस्सा होना चाहिए? भूमि अधिग्रहण और मुआवजे का मुद्दा भी इस बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
किसान संगठनों का आरोप रहा है कि कई मामलों में किसानों को मिला मुआवजा और बाद में उन्हीं जमीनों के बढ़े हुए बाजार मूल्य के बीच भारी अंतर दिखाई दिया। धारणा बनी कि विकास प्रक्रिया का सबसे बड़ा लाभ भूमि निवेशकों और रियल एस्टेट क्षेत्र को मिला। भले ही सरकारें सभी प्रक्रियाओं को कानूनी और पारदर्शी बताती रही हों, लेकिन यह सवाल आज भी बना हुआ है कि विकास का वास्तविक लाभार्थी कौन रहा—किसान, स्थानीय नागरिक और युवा या फिर जमीन आधारित निवेश तंत्र?

कृषि भूमि गैर-कृषि उपयोग में परिवर्तित हुई
16 जून की बैठक में केवल यह नहीं देखा जाना चाहिए कि कितनी परियोजनाएं पूरी हुईं। यह भी पूछा जाना चाहिए कि कितनी कृषि भूमि गैर-कृषि उपयोग में परिवर्तित हुई, कितने हरित क्षेत्र संरक्षित रहे, कितने स्थायी रोजगार पैदा हुए, भूजल संरक्षण में क्या उपलब्धियां हासिल हुईं और प्रदूषण नियंत्रण में वास्तविक सफलता कितनी मिली। यदि हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी एनसीआर की हवा जहरीली, सड़कें जाम और शहर अव्यवस्थित हैं, तो जवाबदेही तय होना भी उतना ही आवश्य
क है जितना नई परियोजनाओं की घोषणा करना। 16 जून की बैठक वास्तव में पांच जिलों की समीक्षा नहीं, बल्कि पूरे एनसीआर विकास मॉडल की परीक्षा है। यह तय करेगी कि क्षेत्रीय योजना-2041 अपने मूल उद्देश्य—संतुलित, टिकाऊ और नागरिक-केंद्रित विकास—की दिशा में आगे बढ़ रही है या फिर विकास की परिभाषा जमीन, बिल्डर और निवेश की राजनीति के बीच कहीं सिमट गई है।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आने वाले वर्षों में एनसीआर को रहने योग्य, सांस लेने योग्य और टिकाऊ क्षेत्र बनाने की प्राथमिकता होगी या फिर विकास का पैमाना केवल नई परियोजनाओं, नए सेक्टरों और बढ़ती जमीन कीमतों से ही तय किया जाता रहेगा। आखिरकार जनता जानना चाहती है कि 31,464 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाली परियोजनाओं,
15,105 करोड़ रुपये से अधिक की ऋण सहायता, 5,921 करोड़ रुपये की अतिरिक्त वित्तीय मदद और 85,522 करोड़ रुपये के केंद्रीय मंत्रालय के बावजूद उसे मिला क्या—बेहतर जीवन, स्वच्छ पर्यावरण और संतुलित विकास या फिर फैलता हुआ कंक्रीट, सिकुड़ती कृषि भूमि और बढ़ती अव्यवस्था?
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यह लेख रितेश सिन्हा के व्यक्तिगत विचार, विश्लेषण और समसामयिक आर्थिक परिस्थितियों की उनकी समझ पर आधारित है। लेख में व्यक्त मत आवश्यक नहीं कि किसी समाचार संस्था, संगठन या प्रकाशक के आधिकारिक विचार हों। इसमें उल्लिखित तथ्य, टिप्पणियां और विश्लेषण सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध सूचनाओं, सरकारी बयानों तथा मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं। लेख का उद्देश्य केवल जनचर्चा और विषय पर विमर्श को बढ़ावा देना है।

