प्रस्तावना
अमेरिका द्वारा लगाए गए 50% टैरिफ ने भारत के सामने एक नई आर्थिक चुनौती खड़ी कर दी है। यह केवल व्यापार या आयात-निर्यात का मुद्दा नहीं है, बल्कि भारत के आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता से जुड़ा प्रश्न है। इस संकट ने हमें याद दिलाया है कि अब समय आ गया है जब राजनीति से ऊपर उठकर, एकजुट होकर इस चुनौती का सामना करना होगा।
🔹 रूस से सीखें : “रूस में मैंने किसी युवा को अमेरिकी पिज़्ज़ा, बर्गर, कोल्ड ड्रिंक के लिए लार टपकाते नहीं देखा; भारत के युवाओं को भी स्वदेशी विकल्प अपनाने चाहिए।”
🔹 राजनीति से ऊपर उठकर : “टैरिफ की चुनौती पर दलगत राजनीति नहीं, सर्वदलीय एकजुटता ही देश की जीत सुनिश्चित करेगी।”
🔹 स्वदेशी विकल्पों का विस्तार : “मेक इन इंडिया और MSME के माध्यम से अमेरिकी उत्पादों के सशक्त विकल्प तैयार करना अब समय की मांग है।”
🔹 विकल्प बाजार की खोज : “यूरोप, खाड़ी देशों, रूस और ब्रिक्स देशों में व्यापार बढ़ाना अमेरिकी टैरिफ का प्रभावी जवाब है।”
🔹 जन भागीदारी की शक्ति : “किसान, युवा और आम नागरिक अमेरिकी उत्पादों के बहिष्कार से स्वदेशी उद्योगों को नया जीवन दे सकते हैं।”
टैरिफ का असर और चुनौतियाँ
131.84 बिलियन डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार में भारत का निर्यात लगभग 86.5 बिलियन डॉलर था। लेकिन 50% टैरिफ से भारत का लगभग 70% निर्यात प्रभावित हो सकता है।
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प्रभावित क्षेत्र: पंजाब का कपड़ा उद्योग, यूपी का चमड़ा व कालीन उद्योग, आभूषण, जूते, कृषि उपकरण।
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छूट वाले क्षेत्र: मोबाइल, स्मार्टफोन, इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मास्यूटिकल्स।
इसका सीधा असर लाखों रोजगार और अरबों डॉलर की अर्थव्यवस्था पर होगा।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों की पकड़
भारत में मोंसेंटो, कारगिल, एमवे, नाइकी और नेस्ले जैसी कंपनियों का कारोबार हजारों करोड़ का है। इनके विकल्प तैयार करना न केवल आर्थिक मजबूरी है, बल्कि आत्मनिर्भरता की दिशा में ठोस कदम भी है।
‘प्रधान मंत्री किसान समृद्धि योजना’ और ‘मेक इन इंडिया’ जैसी योजनाएँ यदि पारदर्शी ढंग से लागू हों, तो विदेशी दबाव बेअसर हो जाएंगे।
रूस से सबक
अमेरिका ने रूस पर हर संभव प्रतिबंध लगाए, लेकिन रूस ने वैकल्पिक बाजार और उत्पाद विकसित कर लिए।
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मास्टरकार्ड–वीज़ा की जगह अपने पेमेंट सिस्टम।
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अमेज़न–गूगल की जगह मजबूत स्थानीय विकल्प।
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फूड और टेक में स्वदेशी ब्रांड।
भारत को भी इसी राह पर चलना होगा।
भारत की सात-सूत्रीय रणनीति
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कूटनीतिक संतुलन और टैरिफ का कड़ा जवाब।
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बहुआयामी व्यापार विस्तार – यूरोप, खाड़ी, रूस, ब्रिक्स देशों की ओर।
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वैकल्पिक निर्यात बाजार और नए लक्ष्य तय करना।
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स्वदेशी उत्पादन की गुणवत्ता बढ़ाकर आत्मनिर्भरता मजबूत करना।
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कृषि नवाचार और MSMEs को बढ़ावा।
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सर्वदलीय समिति का गठन – राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय सहयोग।
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जन भागीदारी और अमेरिकी उत्पादों का बहिष्कार – स्वदेशी विकल्प अपनाना।
निष्कर्ष
यह लड़ाई केवल सरकार की नहीं, बल्कि पूरे देश की है। किसान, युवा, उद्योगपति, गृहणियाँ और विद्यार्थी—हर किसी को अपना योगदान देना होगा। यह समय दलगत राजनीति का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और आत्मनिर्भरता का है।
भारत ने 1971 का युद्ध, 1991 का आर्थिक संकट और कोविड-19 जैसी चुनौतियाँ पार की हैं। अब टैरिफ युद्ध भी जीता जाएगा। हमारी सबसे बड़ी ताकत है – एकता, आत्मविश्वास और स्वदेशी पर भरोसा।
भारत न केवल इस तूफ़ान से बचेगा, बल्कि और मज़बूत होकर उभरेगा।







