भगोरिया को राजकीय मान्यता: अस्मिता, विश्वास और विकास का नया संतुलन

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मध्यप्रदेश सरकार द्वारा भगोरिया पर्व को राजकीय गरिमा प्रदान करने का निर्णय केवल एक सांस्कृतिक घोषणा नहीं, बल्कि जनजातीय अस्मिता को मुख्यधारा में सम्मानपूर्वक स्थापित करने की राजनीतिक और सामाजिक पहल है। मुख्यमंत्री *मोहन यादव* द्वारा बड़वानी के जुलवानिया भगोरिया हाट में की गई यह घोषणा ऐसे समय में आई है, जब देशभर में आदिवासी पहचान, सहभागिता और सम्मान पर व्यापक विमर्श चल रहा है।

भगोरिया, निमाड़ अंचल के भील और भिलाला समुदाय का पारंपरिक उत्सव है। यह केवल रंगों, नृत्य और उल्लास का पर्व नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन, प्रकृति के साथ संतुलन और सामाजिक समरसता का जीवंत प्रतीक है। मांदल की थाप पर कदम मिलाते महिला-पुरुष, पारंपरिक वेशभूषा और सामुदायिक सहभागिता—ये सब मिलकर इस पर्व को एक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति से अधिक, सामाजिक ऊर्जा का उत्सव बनाते हैं। इसे राजकीय मान्यता देना इस सांस्कृतिक पूंजी को स्वीकार करना है, जिसे लंबे समय तक ‘स्थानीय’ या ‘परंपरागत’ कहकर सीमित कर दिया गया था।

भारतीय राजनीति में प्रतीकों का अपना महत्व होता है। किसी लोकपर्व को राजकीय दर्जा देना एक संदेश है—यह बताने का कि राज्य अपनी विविधता को औपचारिक पहचान दे रहा है। पिछले वर्षों में प्रधानमंत्री **नरेंद्र मोदी*के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्तर पर जनजातीय नायकों और परंपराओं को मुख्यधारा में लाने के प्रयास हुए हैं। मध्यप्रदेश का यह निर्णय उसी व्यापक परिप्रेक्ष्य का प्रादेशिक विस्तार माना जा सकता है।

फिर भी, किसी भी प्रतीकात्मक पहल की वास्तविक सफलता उसके व्यावहारिक परिणामों से तय होती है। यदि सांस्कृतिक सम्मान केवल उत्सव तक सीमित रह जाए, तो उसका प्रभाव क्षणिक हो सकता है। किंतु यदि इसे शिक्षा, कृषि, सिंचाई, बाज़ार पहुंच, उद्यमिता और आधारभूत संरचना से जोड़ा जाए, तो यह दीर्घकालिक परिवर्तन का आधार बन सकता है।

इसी संदर्भ में बड़वानी में घोषित विकास योजनाएं महत्वपूर्ण हैं। आधुनिक सब्जी मंडी, 50 एकड़ में आदर्श बीज उत्पादन केंद्र, माइक्रो सिंचाई परियोजनाएं, कोल्ड स्टोरेज और फूड प्रोसेसिंग इकाइयों की स्थापना—ये सभी पहलें दर्शाती हैं कि सरकार सांस्कृतिक सम्मान को आर्थिक सशक्तिकरण से जोड़ना चाहती है। निमाड़ क्षेत्र पहले ही उद्यानिकी और विविध कृषि उत्पादन के लिए जाना जाता है। यदि घोषित योजनाएं प्रभावी रूप से लागू होती हैं, तो यह क्षेत्र मूल्य संवर्धन और कृषि-आधारित उद्योगों के माध्यम से किसानों की आय में वास्तविक वृद्धि कर सकता है।

यहां मूल प्रश्न यह है कि क्या यह पहल प्रतीक से नीति तक का सफल संक्रमण कर पाएगी? जनजातीय क्षेत्रों में अभी भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और बाज़ार तक पहुंच जैसी चुनौतियां मौजूद हैं। यदि सांस्कृतिक अस्मिता के सम्मान के साथ-साथ इन बुनियादी क्षेत्रों में स्थायी सुधार होते हैं, तभी यह निर्णय ऐतिहासिक महत्व प्राप्त करेगा।

भगोरिया को राजकीय पर्व घोषित करना एक सकारात्मक संकेत है—यह बताता है कि विविधता को सम्मान देना लोकतंत्र की शक्ति है। अब आवश्यकता है कि यह सम्मान सतत विकास की ठोस संरचना में परिवर्तित हो। यदि संस्कृति और विकास का यह संतुलन कायम रहता है, तो भगोरिया केवल एक पर्व नहीं रहेगा, बल्कि सहभागी शासन और सामाजिक विश्वास का प्रतीक बन जाएगा।

 

(मुकाम सिंह किराड़े, लेखक पूर्व विधायक है )

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