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मादक पदार्थों के दुरुपयोग के खिलाफ सीमाओं से परे एकजुटता

On: Tuesday, February 17, 2026 6:23 PM
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हम्फ्री फ़ेलोशिप के माध्यम से डॉ. कौस्तुभ शर्मा ने रोकथाम, उपचार और समुदाय-आधारित रणनीतियों पर किया गहन अध्ययन

नई दिल्ली। मादक पदार्थों का दुरुपयोग आज एक वैश्विक चुनौती बन चुका है, जिसका प्रभाव न केवल व्यक्तियों बल्कि पूरे परिवार और समाज पर पड़ रहा है। अब सरकारें यह समझने लगी हैं कि इस समस्या का स्थायी समाधान केवल कानून प्रवर्तन तक सीमित नहीं हो सकता, बल्कि इसके लिए रोकथाम, उपचार और पुनर्वास को समान रूप से मजबूत करना आवश्यक है।

इसी दिशा में कानून प्रवर्तन और सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञ डॉ. कौस्तुभ शर्मा ने Hubert H. Humphrey Fellowship Program में भाग लिया। यह फ़ेलोशिप अमेरिकी विदेश विभाग द्वारा प्रायोजित एक प्रतिष्ठित कार्यक्रम है, जो अंतरराष्ट्रीय और अमेरिकी पेशेवरों को वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा और सामाजिक चुनौतियों पर साझा समाधान विकसित करने का अवसर प्रदान करता है।

डॉ. शर्मा ने बताया कि उनकी फ़ेलोशिप का मुख्य उद्देश्य मादक पदार्थों के दुरुपयोग से निपटने के लिए विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय स्थापित करना, बहु-एजेंसी तंत्र विकसित करना तथा रोकथाम, उपचार और पुनर्वास की भूमिका को गहराई से समझना था।

अमेरिका के अनुभवों से मिली सीख

2018 में Virginia Commonwealth University में फ़ेलोशिप के दौरान डॉ. शर्मा ने यह अध्ययन किया कि अमेरिका में संस्थान किस प्रकार डेटा-आधारित नीति और सामुदायिक भागीदारी के जरिए मादक पदार्थों के दुरुपयोग से निपटते हैं। उन्होंने देखा कि अमेरिका में वर्ष में दो बार गुमनाम सर्वेक्षण कर युवाओं में नशे के रुझानों की निगरानी की जाती है, जिससे नीति-निर्माताओं को समय पर हस्तक्षेप करने में सहायता मिलती है।

उन्होंने वर्जीनिया फ़ाउंडेशन फ़ॉर हेल्दी यूथ जैसे संगठनों से यह भी सीखा कि युवाओं की भागीदारी से रोकथाम अभियानों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। इसके अलावा, ड्रग ट्रीटमेंट कोर्ट्स की भूमिका उनके लिए एक महत्वपूर्ण सीख रही, जो पहली बार अपराध करने वालों को दंड की बजाय उपचार से जोड़ते हैं।

डॉ. शर्मा ने अल्कोहॉलिक्स एनॉनिमस (AA), नारकोटिक्स एनॉनिमस (NA) और स्मार्ट रिकवरी जैसे सहकर्मी-सहायता मॉडलों का भी अध्ययन किया, जहां समुदाय और पूर्व उपयोगकर्ता मेंटर की भूमिका निभाते हैं।

राष्ट्रीय एजेंसियों से संवाद

फ़ेलोशिप के दौरान उन्होंने Substance Abuse and Mental Health Services Administration, National Institute on Drug Abuse और Drug Enforcement Administration जैसी एजेंसियों का दौरा किया। इन यात्राओं से उन्हें यह समझने का अवसर मिला कि अनुसंधान, सार्वजनिक स्वास्थ्य और कानून प्रवर्तन किस प्रकार एकीकृत होकर कार्य करते हैं।

भारत में लागू की गई पहल

भारत लौटने के बाद डॉ. शर्मा ने अमेरिकी अनुभवों को स्थानीय जरूरतों के अनुसार ढालना शुरू किया। उन्होंने स्मार्ट रिकवरी कार्यक्रम को भारत में प्रस्तुत किया और सरकारी मनोचिकित्सकों को इसके फ़ैसिलिटेटर के रूप में प्रशिक्षित किया।

इसके साथ ही, उन्होंने अमेरिका की तर्ज पर सामुदायिक गठबंधनों के निर्माण को प्रोत्साहित किया, जिससे महिलाओं और बच्चों को सुरक्षित रूप से अपनी समस्याएं साझा करने का मंच मिला और समय रहते हस्तक्षेप संभव हो सका।

अमेरिका–भारत सहयोग पर जोर

डॉ. शर्मा का मानना है कि अर्ध-सिंथेटिक ओपिओइड्स और हेरोइन जैसी दवाओं की तस्करी से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि गोल्डन क्रेसेंट क्षेत्र विश्व के लगभग 80 प्रतिशत हेरोइन उत्पादन के लिए जिम्मेदार है, जिससे भारत और अमेरिका दोनों प्रभावित हो रहे हैं।

उनके अनुसार, सीमा नियंत्रण, समुद्री सहयोग और वित्तीय नेटवर्क पर कार्रवाई से तस्करी गिरोहों को कमजोर किया जा सकता है।

रोकथाम ही सबसे बड़ा समाधान

डॉ. शर्मा ने कहा कि यद्यपि कानून प्रवर्तन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन स्थायी समाधान डेटा, सामुदायिक सहभागिता और समन्वित रोकथाम, उपचार व पुनर्वास प्रयासों से ही संभव है।
उन्होंने जोर देते हुए कहा, “सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि रोकथाम पर निवेश किया जाए। जिन बच्चों को समय रहते मार्गदर्शन और समर्थन मिल जाता है, वे नशे से दूर रहने की अधिक संभावना रखते हैं। यही किसी भी समाज के लिए सबसे सकारात्मक परिणाम है।”

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