मोदी सरकार शिक्षा नीति: ‘प्रधान’ के राज में शिक्षा का बंटाधार?

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12 वर्षों के शासन में ‘विश्वगुरु’ का सपना, लेकिन विश्व के शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों में भारत अब भी बाहर

रितेश सिन्हा- वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक

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12 वर्षों के शासन में ‘विश्वगुरु’ का सपना, लेकिन विश्व के शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों में भारत अब भी बाहरविश्वगुरु के दावों और शिक्षा की वास्तविक तस्वीर58 इंजीनियरिंग कॉलेजों की बंदी ने खड़े किए गंभीर सवालक्या नई शिक्षा नीति अपेक्षित बदलाव ला पाई?शिक्षा बजट बढ़ा, लेकिन लक्ष्य अब भी अधूरासंस्थानों की संख्या बढ़ी, गुणवत्ता का संकट बरकरारविश्व रैंकिंग में भारत अब भी पीछेशोध और नवाचार में सीमित निवेशप्रचार बनाम शिक्षा के वास्तविक परिणामशिक्षकों की कमी और शोध का संकटरोजगार और कौशल के बीच बढ़ती दूरीविदेशों की ओर बढ़ता छात्रों का पलायननई शिक्षा नीति की सफलता का असली पैमानासरकार की उपलब्धियां और उनकी सीमाएंक्या शिक्षा को पर्याप्त प्राथमिकता मिली?12 वर्षों बाद जवाबदेही का सवालएआईसीटीई की कार्रवाई क्या बड़ी चेतावनी है?निष्कर्ष: क्या ‘विश्वगुरु’ का सपना अधूरा है?

विश्वगुरु के दावों और शिक्षा की वास्तविक तस्वीर

साल 2014 में सत्ता संभालने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सामने “विश्वगुरु भारत”, “डिजिटल इंडिया”, “स्टार्टअप इंडिया”, “स्किल इंडिया”, “आत्मनिर्भर भारत”, “अमृतकाल” और “विकसित भारत-2047” जैसे बड़े लक्ष्य रखे। वर्ष 2020 में नई शिक्षा नीति को आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा शिक्षा सुधार बताया गया। दावा किया गया कि भारत ज्ञान-आधारित महाशक्ति बनेगा, भारतीय विश्वविद्यालय दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में शामिल होंगे और देश शोध एवं नवाचार का वैश्विक केंद्र बनेगा। लेकिन मोदी सरकार शिक्षा नीति के 12 वर्षों के शासन के बाद यदि शिक्षा व्यवस्था का मूल्यांकन नारों के बजाय परिणामों के आधार पर किया जाए, तो तस्वीर सरकार के दावों से मेल नहीं खाती।

58 इंजीनियरिंग कॉलेजों की बंदी ने खड़े किए गंभीर सवाल

देशभर में 58 इंजीनियरिंग एवं तकनीकी कॉलेजों को अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) ने “प्रोग्रेसिव क्लोजर” की अनुमति दी है। इसके साथ 950 से अधिक इंजीनियरिंग एवं तकनीकी पाठ्यक्रम भी बंद कर दिए गए हैं। परिषद के अनुसार इसके पीछे लगातार घटता नामांकन, योग्य शिक्षकों की कमी, कमजोर प्रयोगशालाएं और निर्धारित शैक्षणिक मानकों को पूरा न कर पाना प्रमुख कारण हैं। सबसे अधिक प्रभावित उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र हैं, जहां 12-12 कॉलेज बंद हो रहे हैं। इसके बाद मध्य प्रदेश में 8, तेलंगाना और पंजाब में 4-4, तथा आंध्र प्रदेश और राजस्थान में 3-3 संस्थानों पर कार्रवाई हुई है। हरियाणा, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के भी कुछ संस्थान इस सूची में शामिल हैं।

क्या नई शिक्षा नीति अपेक्षित बदलाव ला पाई?

यह केवल 58 कॉलेजों का मामला नहीं है। यह उस तकनीकी शिक्षा मॉडल पर सवाल है, जिसे पिछले 12 वर्षों में “न्यू इंडिया” की रीढ़ बताया गया। यदि नई शिक्षा नीति वास्तव में परिवर्तनकारी है, तो उसके लागू होने के छह वर्ष बाद इंजीनियरिंग संस्थानों पर ताले क्यों लग रहे हैं? आखिर ऐसी कौन-सी नीति या निगरानी की कमी रही कि सैकड़ों पाठ्यक्रम छात्रों के अभाव में बंद करने पड़े?

शिक्षा बजट बढ़ा, लेकिन लक्ष्य अब भी अधूरा

मोदी सरकार शिक्षा बजट में वृद्धि को अपनी उपलब्धि बताती है। वास्तव में 2026-27 के केंद्रीय बजट में शिक्षा मंत्रालय के लिए आवंटन बढ़ाया गया है। लेकिन किसी भी बजट का मूल्यांकन उसकी राशि से नहीं, बल्कि उसके परिणामों से होता है। आज भी भारत में शिक्षा पर कुल सार्वजनिक व्यय सकल घरेलू उत्पाद के लगभग चार प्रतिशत के आसपास है, जबकि कोठारी आयोग और राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 दोनों ने इसे छह प्रतिशत तक ले जाने की सिफारिश की थी। छह दशक बाद भी यह लक्ष्य अधूरा है।

संस्थानों की संख्या बढ़ी, गुणवत्ता का संकट बरकरार

सरकार यह भी गिनाती है कि नए आईआईटी, आईआईएम, एम्स और केंद्रीय विश्वविद्यालय खोले गए हैं। यह उपलब्धि अपनी जगह महत्वपूर्ण है। लेकिन शिक्षा केवल भवन, परिसरों और घोषणाओं से नहीं बदलती। उसकी गुणवत्ता इस बात से तय होती है कि विश्वविद्यालयों में कितना शोध हो रहा है, कितने पेटेंट विकसित हो रहे हैं, कितने छात्र वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं और उद्योगों को कितनी गुणवत्ता वाला मानव संसाधन मिल रहा है।

विश्व रैंकिंग में भारत अब भी पीछे

यहीं मोदी सरकार के दावों की सबसे कठिन परीक्षा होती है। क्यूएस विश्व विश्वविद्यालय रैंकिंग-2026 में भारत का कोई भी विश्वविद्यालय शीर्ष 100 में जगह नहीं बना पाया। आईआईटी दिल्ली भारतीय संस्थानों में सर्वोच्च स्थान पर है, लेकिन वह भी शीर्ष 100 से बाहर है। दूसरी ओर चीन, सिंगापुर और दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई देशों ने अपने कई विश्वविद्यालयों को विश्व के अग्रणी संस्थानों में स्थापित कर दिया है। यदि भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है, तो उसकी उच्च शिक्षा अभी भी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पीछे क्यों है?

शोध और नवाचार में सीमित निवेश

स्थिति शोध एवं नवाचार के क्षेत्र में भी बहुत उत्साहजनक नहीं है। भारत अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) पर अपने सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 0.64 प्रतिशत ही खर्च करता है, जबकि चीन, अमेरिका, दक्षिण कोरिया और इज़राइल जैसे देश इससे कई गुना अधिक निवेश करते हैं। प्रधानमंत्री लगातार भारत को नवाचार आधारित अर्थव्यवस्था बनाने की बात करते हैं, लेकिन यदि शोध पर निवेश ही सीमित रहेगा तो विश्वस्तरीय तकनीक, पेटेंट और वैज्ञानिक उपलब्धियों में भारत नेतृत्व कैसे करेगा?

प्रचार बनाम शिक्षा के वास्तविक परिणाम

मोदी सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उसका प्रभावी जनसंपर्क और आक्रामक प्रचार रहा है। लेकिन शिक्षा ऐसा क्षेत्र है, जहां प्रचार नहीं, परिणाम बोलते हैं। यदि 12 वर्षों के शासन के बाद भी भारत विश्व के शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों में स्थान नहीं बना पाया, शिक्षा पर सार्वजनिक निवेश घोषित लक्ष्यों से कम है और दूसरी ओर तकनीकी संस्थानों पर ताले लग रहे हैं, तो यह पूछना पूरी तरह उचित है कि क्या शिक्षा वास्तव में सरकार की सर्वोच्च राजनीतिक प्राथमिकताओं में रही है, या फिर वह भी घोषणाओं और अभियानों तक सीमित रह गई?

शिक्षकों की कमी और शोध का संकट

देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था का दूसरा सबसे बड़ा संकट शिक्षकों और शोध का अभाव है।

रोजगार और कौशल के बीच बढ़ती दूरी

केंद्रीय विश्वविद्यालयों से लेकर अनेक राज्य विश्वविद्यालयों तक हजारों शिक्षकों के पद वर्षों से रिक्त पड़े हैं। कई संस्थानों में नियमित शिक्षकों के स्थान पर अतिथि अथवा संविदा शिक्षकों के भरोसे पढ़ाई चल रही है। आधुनिक प्रयोगशालाओं, शोध अनुदान और उद्योगों के साथ मजबूत साझेदारी के अभाव ने उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित किया है। इसका परिणाम यह है कि बड़ी संख्या में छात्र डिग्री तो हासिल कर लेते हैं, लेकिन उद्योगों की अपेक्षाओं के अनुरूप कौशल विकसित नहीं कर पाते। रोजगार बाजार और विश्वविद्यालयों के बीच बढ़ती यह दूरी भारत की युवा आबादी के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है।

विदेशों की ओर बढ़ता छात्रों का पलायन

यही कारण है कि हर वर्ष लाखों भारतीय छात्र उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और अन्य देशों का रुख कर रहे हैं। परिवार अपनी जीवनभर की बचत विदेशों में शिक्षा पर खर्च करने को विवश हैं। यदि भारत के विश्वविद्यालय विश्वस्तरीय शिक्षा, शोध और अवसर उपलब्ध करा रहे होते, तो क्या इतनी बड़ी संख्या में छात्रों का पलायन होता? यह केवल विदेशी मुद्रा के बाहर जाने का मामला नहीं, बल्कि देश की प्रतिभा और बौद्धिक पूंजी के लगातार बाहर जाने का भी प्रश्न है।

नई शिक्षा नीति की सफलता का असली पैमाना

नई शिक्षा नीति-2020 को सरकार ने ऐतिहासिक बदलाव का दस्तावेज बताया था। बहुविषयक शिक्षा, मातृभाषा में पढ़ाई, लचीला पाठ्यक्रम, कौशल विकास और शोध को बढ़ावा देने जैसे कई सकारात्मक प्रावधान उसमें शामिल हैं। लेकिन किसी भी नीति की सफलता उसकी घोषणा से नहीं, बल्कि उसके परिणामों से तय होती है। यदि नीति लागू होने के छह वर्ष बाद 58 इंजीनियरिंग एवं तकनीकी कॉलेजों पर ताले लग रहे हैं, 950 से अधिक तकनीकी पाठ्यक्रम बंद किए जा रहे हैं और विश्व के शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों में भारत अब भी जगह नहीं बना पा रहा है, तो यह पूछना स्वाभाविक है कि नीति का वास्तविक प्रभाव आखिर दिखाई कहां देता है?

सरकार की उपलब्धियां और उनकी सीमाएं

सरकार यह तर्क दे सकती है कि उसने नए आईआईटी, आईआईआईटी, एम्स और केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित किए, डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा दिया और शिक्षा बजट में उल्लेखनीय वृद्धि की। इन उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन किसी भी सरकार का अंतिम मूल्यांकन घोषणाओं, विज्ञापनों और नई इमारतों से नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता, शोध, नवाचार और युवाओं के भविष्य से होता है। यदि परिणाम अपेक्षित नहीं हैं, तो नीतियों की समीक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।

क्या शिक्षा को पर्याप्त प्राथमिकता मिली?

एक और महत्वपूर्ण प्रश्न सरकार की प्राथमिकताओं का है।

12 वर्षों बाद जवाबदेही का सवाल

पिछले 12 वर्षों में राजमार्गों, एक्सप्रेस-वे, रेलवे, रक्षा, डिजिटल अवसंरचना और पूंजीगत निवेश पर अभूतपूर्व खर्च हुआ। यह विकास का आवश्यक हिस्सा है। लेकिन क्या विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और उच्च शिक्षा को भी उसी स्तर की प्राथमिकता मिली? यदि शिक्षा वास्तव में राष्ट्रीय विकास का आधार है, तो शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय आज भी सकल घरेलू उत्पाद के लगभग चार प्रतिशत के आसपास क्यों है? छह प्रतिशत का लक्ष्य अब भी केवल नीति दस्तावेजों तक सीमित क्यों है?

राजनीतिक दृष्टि से यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश से व्यवस्था परिवर्तन का वादा किया था। 2026 तक लगातार 12 वर्षों के शासन के बाद अब शिक्षा व्यवस्था की हर कमी के लिए पिछली सरकारों, राज्यों या निजी संस्थानों को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त उत्तर नहीं माना जा सकता। जब हर उपलब्धि का राजनीतिक श्रेय केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री स्वयं लेते हैं, तो शिक्षा व्यवस्था की कमियों पर जवाबदेही भी उसी नेतृत्व से तय होगी। लोकतंत्र में सत्ता केवल उपलब्धियों का सम्मान नहीं, बल्कि कमियों का उत्तरदायित्व भी मांगती है।

एआईसीटीई की कार्रवाई क्या बड़ी चेतावनी है?

एआईसीटीई द्वारा 58 इंजीनियरिंग कॉलेजों की क्रमिक बंदी और 950 से अधिक तकनीकी पाठ्यक्रमों का समाप्त होना केवल कुछ संस्थानों की प्रशासनिक विफलता नहीं है। यह उस व्यापक संकट की चेतावनी है, जिसमें शिक्षा की गुणवत्ता, शोध, रोजगार, संकाय और नीति—सभी पर गंभीर पुनर्विचार की आवश्यकता है। यदि समय रहते विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता, शिक्षकों की नियुक्ति, अनुसंधान निवेश और उद्योगों के साथ समन्वय पर निर्णायक कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में ऐसे और संस्थानों पर भी ताले लग सकते हैं।

निष्कर्ष: क्या ‘विश्वगुरु’ का सपना अधूरा है?

12 वर्षों के शासन के बाद यह सवाल पूछने का अधिकार है कि “विश्वगुरु भारत” का सपना शिक्षा के क्षेत्र में आखिर कितना आगे बढ़ा? यदि विश्व के शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों में भारत का एक भी संस्थान नहीं है, अनुसंधान पर निवेश प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बेहद कम है, शिक्षा पर छह प्रतिशत जीडीपी खर्च का लक्ष्य अब भी अधूरा है, 58 इंजीनियरिंग कॉलेज बंद हो रहे हैं और 950 से अधिक तकनीकी पाठ्यक्रम समाप्त किए जा रहे हैं, यह संस्थानों की विफलता नहीं, बल्कि नीतिगत प्राथमिकताओं की भी परीक्षा है।

शिक्षा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी होती है। मजबूत विश्वविद्यालय, उत्कृष्ट शोध, प्रशिक्षित शिक्षक और रोजगारोन्मुख शिक्षा ही किसी देश को वास्तविक अर्थों में महाशक्ति बनाते हैं। यदि इन आधारों को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिलेगी, तो “विश्वगुरु”, “अमृतकाल” और “विकसित भारत-2047” जैसे लक्ष्य नारे तो बने रहेंगे, लेकिन उन्हें धरातल पर उतारना कठिन होगा। 12 वर्षों के शासन के बाद अब देश केवल नए वादे नहीं, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे ठोस परिणाम चाहता है जो दुनिया को यह विश्वास दिला सकें कि भारत केवल आर्थिक शक्ति ही नहीं, बल्कि ज्ञान और नवाचार की भी अग्रणी महाशक्ति बनने की दिशा में वास्तव में आगे बढ़ रहा है।

अस्वीकरण: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तथ्यों, आंकड़ों और रिपोर्टों पर आधारित लेखक का व्यक्तिगत विश्लेषण है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और इनका उद्देश्य केवल जनहित में विषय पर विमर्श प्रस्तुत करना है।

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