भागवत-प्रियंक की राजनीतिक नूराकुश्ती में निशाने पर संघ, हिंदुत्व और कांग्रेस

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संघ के शताब्दी वर्ष में रक्षात्मक दिखते भागवत, खड़गे के नेतृत्व में सिमटती कांग्रेस

खड़गे की राजनीति को मिला मुद्दा, भागवत ने दिया मंच

शताब्दी वर्ष की दहलीज पर संघ आखिर विरोधियों के एजेंडे पर क्यों खेल रहा है?

संघ की प्रतिक्रिया ने खड़े किए नए सवाल

रितेश सिन्हा दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने लगभग सौ वर्ष के इतिहास में वामपंथियों के हमले झेले, कांग्रेस के प्रतिबंध झेले, वैचारिक विरोध झेला और राजनीतिक आरोप भी झेले। लेकिन शायद ही ऐसा कोई दौर रहा हो जब संघ का सर्वोच्च नेतृत्व अपने विरोधियों द्वारा बिछाए गए राजनीतिक जाल में इतना सहजता से फंसता दिखाई दिया हो। कर्नाटक सरकार के मंत्री प्रियंक खड़गे के पत्र और उस पर मोहन भागवत की प्रतिक्रिया ने यही प्रश्न खड़ा कर दिया है।

 

क्या एक क्षेत्रीय नेता का पत्र इतना महत्वपूर्ण था?

 

सवाल यह नहीं है कि प्रियंक खड़गे ने क्या पूछा। कांग्रेस दशकों से संघ पर सवाल उठाती रही है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या बदल गया कि संघ प्रमुख को एक राज्य स्तरीय नेता के राजनीतिक पत्र का जवाब देने की आवश्यकता महसूस हुई? यदि एक क्षेत्रीय मंत्री के पत्र से संघ की सर्वोच्च नेतृत्व पंक्ति विचलित होती दिखाई दे, तो यह विरोधियों की ताकत नहीं बल्कि नेतृत्व की असुरक्षा का संकेत माना जाएगा।

 

प्रियंक खड़गे ने संघ के पंजीकरण और जवाबदेही को लेकर प्रश्न पूछे। राजनीतिक दृष्टि से यह कोई नया हथियार नहीं था। कांग्रेस वर्षों से यही करती रही है। लेकिन असली राजनीतिक भूल संघ की ओर से हुई। भागवत ने केरल में जिस प्रकार हिंदू धर्म के पंजीकरण का उदाहरण दिया, उससे उन्होंने प्रियंक खड़गे को वह राजनीतिक अवसर दे दिया जिसकी शायद उन्हें स्वयं भी उम्मीद नहीं रही होगी।

 

संघ और हिंदू धर्म की तुलना ने बढ़ाया विवाद

 

संघ और हिंदू धर्म की तुलना करके भागवत ने अनजाने में संघ के आलोचकों को नया तर्क दे दिया। प्रश्न आरएसएस की संगठनात्मक स्थिति पर था, उत्तर हिंदू धर्म पर आया। प्रश्न संस्था पर था, उत्तर सभ्यता पर दिया गया। प्रश्न प्रशासनिक था, उत्तर वैचारिक बन गया। राजनीति में इसे जवाब नहीं, बल्कि रक्षात्मक प्रतिक्रिया माना जाता है।

 

क्या संघ अपना वैचारिक विमर्श खो रहा है?

यही कारण है कि संघ के भीतर और बाहर दोनों जगह यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या मोहन भागवत के नेतृत्व में संगठन अपनी वैचारिक धार खोता जा रहा है। संघ का इतिहास बताता है कि उसके पूर्व सरसंघचालक विरोधियों की भाषा में नहीं बोलते थे। वे अपना विमर्श स्वयं गढ़ते थे। आज स्थिति उलटी दिखाई देती है। विरोधी प्रश्न तय करते हैं और संघ उनके उत्तर खोजता नजर आता है।

 राजनीतिक सफलता के बावजूद रक्षात्मक क्यों?

 

यह आलोचना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भागवत किसी साधारण कालखंड के सरसंघचालक नहीं हैं। उनके कार्यकाल में भाजपा ने अभूतपूर्व राजनीतिक सफलता प्राप्त की। केंद्र में लगातार सत्ता, राज्यों में विस्तार और राष्ट्रीय विमर्श पर प्रभाव—संघ को शायद ही कभी इतना अनुकूल राजनीतिक वातावरण मिला हो। लेकिन विडंबना देखिए कि इसी दौर में संघ का नेतृत्व सबसे अधिक सफाई देता दिखाई पड़ रहा है।

 

शताब्दी वर्ष का एजेंडा और बदलती बहस

 

संघ का शताब्दी वर्ष है। यह आत्मविश्वास, उपलब्धियों और भविष्य की दिशा प्रस्तुत करने का अवसर होना चाहिए था। लेकिन बहस इस बात पर हो रही है कि संघ को पंजीकरण की आवश्यकता है या नहीं। यह स्थिति स्वयं बताती है कि राजनीतिक शक्ति और वैचारिक शक्ति हमेशा एक ही चीज नहीं होतीं।

कांग्रेस की मजबूरी या वैचारिक संघर्ष?

दूसरी तरफ प्रियंक खड़गे और कांग्रेस भी किसी मजबूत स्थिति में नहीं हैं। यदि कांग्रेस वास्तव में वैचारिक संघर्ष जीत रही होती तो उसे हर कुछ दिनों में संघ को राजनीतिक ऑक्सीजन देने की आवश्यकता नहीं पड़ती। प्रियंक खड़गे का पत्र उतना ही कांग्रेस की बेचैनी का दस्तावेज है जितना संघ की प्रतिक्रिया उसकी रक्षात्मकता का।

मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व में कांग्रेस अभी तक यह तय नहीं कर सकी है कि वह भाजपा का विकल्प कैसे बनेगी। संगठन सिकुड़ रहा है, राज्यों में आधार कमजोर हुआ है और पार्टी की राजनीति अब भी बड़े पैमाने पर भाजपा-विरोध तक सीमित है। ऐसे में प्रियंक खड़गे का संघ-विरोध कांग्रेस के वैचारिक आत्मविश्वास का नहीं बल्कि राजनीतिक रिक्तता का प्रमाण अधिक दिखाई देता है।

इस विवाद में जीत किसी की नहीं

 

विडंबना यह है कि इस पूरे विवाद में दोनों पक्ष हारते नजर आते हैं। कांग्रेस संघ को कटघरे में खड़ा करना चाहती थी लेकिन अपनी ही संगठनात्मक कमजोरियों की याद दिला बैठी। संघ अपनी वैचारिक श्रेष्ठता प्रदर्शित करना चाहता था लेकिन विरोधियों के एजेंडे पर प्रतिक्रिया देकर स्वयं को रक्षात्मक स्थिति में ले आया।

 सबसे बड़ा सवाल मोहन भागवत से

सबसे बड़ा प्रश्न आखिरकार मोहन भागवत से ही पूछा जाएगा। जब संघ के पास राजनीतिक प्रभाव, सामाजिक नेटवर्क और ऐतिहासिक विरासत सब कुछ है, तब उसे प्रियंक खड़गे जैसे नेताओं के पत्रों का जवाब देने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? क्या यह वही संघ है जो कभी विमर्श तय करता था, या अब वह उस दौर में प्रवेश कर चुका है जहां उसके विरोधी प्रश्न तय करेंगे और वह उत्तर देता रहेगा?

 

निष्कर्ष: विरोधी को मिला अनावश्यक महत्व

 

यही इस पूरे विवाद का सबसे असहज निष्कर्ष है। प्रियंक खड़गे ने संघ को घेरने के लिए पत्र लिखा था, लेकिन संघ प्रमुख की प्रतिक्रिया ने उस पत्र को अपेक्षा से कहीं अधिक महत्व दे दिया। राजनीति में इसे विरोधी को हराना नहीं, बल्कि उसे अनावश्यक महत्व देना कहा जाता है। इस पूरे प्रकरण में मोहन भागवत के नेतृत्व पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न बनकर उभरता है।

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