रितेश सिन्हा | चेन्नई, तमिलनाडु सरकार और केंद्र सरकार के बीच अखिल भारतीय सेवा (आईएएस) नियमों को लेकर एक नया टकराव सामने आया है। केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) की स्पष्ट अस्वीकृति के बावजूद राज्य सरकार द्वारा 1995 बैच के आईएएस अधिकारियों को मुख्य सचिव/अतिरिक्त मुख्य सचिव स्तर के एपेक्स स्केल में पदोन्नति देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाए जाने से संवैधानिक और प्रशासनिक संकट गहराता दिख रहा है।
डीओपीटी की आपत्ति के बावजूद आगे बढ़ी प्रक्रिया
डीओपीटी ने तमिलनाडु सरकार के प्रस्ताव को आईएएस (पे) नियम, 2016 के नियम 12(7), कैडर स्ट्रेंथ नियमों और एपेक्स स्तर पर अनुमेय पदों की सीमा के उल्लंघन का हवाला देते हुए अस्वीकार कर दिया था। विभाग ने स्पष्ट किया कि राज्य पहले ही तय सीमा से अधिक एपेक्स पद संचालित कर रहा है, ऐसे में किसी अतिरिक्त पदोन्नति की अनुमति नहीं दी जा सकती।
इसके बावजूद तमिलनाडु सरकार ने मुख्य सचिव ग्रेड स्क्रीनिंग कमेटी का गठन कर लिया है और केंद्र सरकार की सेवा में कार्यरत एस. गोपालकृष्णन, आईएएस (चेयरमैन, स्टाफ सिलेक्शन कमेटी) को 29 दिसंबर 2025 को प्रस्तावित बैठक में आमंत्रित किया है।
केंद्र–राज्य टकराव गहराया
मीडिया से बातचीत में गोपालकृष्णन ने कहा,
“मुझे तमिलनाडु सरकार के सचिव का पत्र मिला है। मैं मीटिंग में जाऊंगा, क्यों नहीं जा सकता?”
इस बयान के बाद कई गंभीर सवाल उठने लगे हैं—
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डीओपीटी की अस्वीकृति के बाद क्या राज्य सरकार ऐसी समिति गठित कर सकती है?
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क्या यह अखिल भारतीय सेवा नियमों और संघीय ढांचे का उल्लंघन नहीं है?
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क्या केंद्र में तैनात कोई आईएएस अधिकारी अस्वीकृत राज्य प्रक्रिया में भाग ले सकता है?
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क्या यह प्रधानमंत्री के अधीन डीओपीटी के अधिकार को कमजोर करने का प्रयास है?
कानूनी विशेषज्ञों की चेतावनी
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि तमिलनाडु सरकार की यह कार्रवाई अल्ट्रा वायर्स (अधिकार क्षेत्र से बाहर) है। विशेषज्ञों के अनुसार, केंद्र सरकार के अधिकारी की भागीदारी आईएएस सेवा आचरण नियमों का उल्लंघन मानी जा सकती है, क्योंकि अखिल भारतीय सेवाओं पर अंतिम नियंत्रण केंद्र सरकार का होता है।
उनका कहना है कि जब राज्य में कोई प्रशासनिक आपात स्थिति नहीं है और पहले से ही एपेक्स स्तर पर अधिक अधिकारी कार्यरत हैं, तब यह कदम अनावश्यक वित्तीय बोझ बढ़ाने और चुनिंदा अधिकारियों को लाभ पहुंचाने का प्रयास प्रतीत होता है। यह मामला अदालत में चुनौती का विषय बन सकता है।
राष्ट्रीय स्तर पर बहस
इस घटनाक्रम ने राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी है। सवाल उठ रहा है कि क्या केंद्र सरकार अब सख्त कदम उठाएगी या राज्य की इस पहल को नजरअंदाज किया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि डीओपीटी को तत्काल हस्तक्षेप कर सेवा नियमों के अनुपालन को सुनिश्चित करना चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यदि इस मामले को रोका नहीं गया तो यह अन्य राज्यों के लिए भी एक नजीर बन सकता है, जिससे भविष्य में संघीय ढांचे में तनाव बढ़ने की आशंका है। कुल मिलाकर, तमिलनाडु सरकार का यह कदम प्रशासनिक सुशासन और संवैधानिक संतुलन पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।







